जुमे के ख़ुत्बे के बाद इक़ामत क्यों होती है? इक़ामत में क्या पढ़ते हैं?
जुमे का दिन मुसलमानों के लिए बहुत अहम दिन है। इस दिन ज़ुहर की जगह जुमे की नमाज़ जमाअत के साथ अदा की जाती है और नमाज़ से पहले इमाम ख़ुत्बा देता है।

लेकिन एक सवाल अक्सर लोगों के ज़हन में आता है—जुमे के ख़ुत्बे के बाद इक़ामत क्यों कही जाती है? इक़ामत में क्या पढ़ा जाता है? इसे कौन पढ़ सकता है और इसे किस तरह पढ़ना चाहिए?
इस लेख में हम जुमे के ख़ुत्बे के बाद इक़ामत की वजह, सहीह हदीस, इस्लामी तारीख़, क़ुरआनी हवाला, इक़ामत के पूरे अल्फ़ाज़ और उसे पढ़ने के तरीक़े को आसान अंदाज़ में समझेंगे।
इक़ामत क्या है?
इक़ामत वह ऐलान है जो फ़र्ज़ नमाज़ की जमाअत शुरू होने से ठीक पहले किया जाता है।
अज़ान का मक़सद लोगों को नमाज़ के लिए बुलाना है, जबकि इक़ामत का मक़सद यह बताना है कि अब नमाज़ शुरू होने वाली है।
इक़ामत के अल्फ़ाज़ अज़ान से मिलते-जुलते हैं, लेकिन दोनों में कुछ फ़र्क़ है और इक़ामत आम तौर पर मुख़्तसर अंदाज़ में कही जाती है।
जुमे के दिन भी ख़ुत्बा पूरा होने के बाद इक़ामत कही जाती है और उसके बाद जुमे की फ़र्ज़ नमाज़ अदा की जाती है।
जुमे के ख़ुत्बे के बाद इक़ामत क्यों होती है?
जुमे के दिन इमाम पहले ख़ुत्बा देता है, फिर थोड़ी देर बैठता है और उसके बाद दूसरा ख़ुत्बा देता है।
दूसरा ख़ुत्बा पूरा होने के बाद इक़ामत कही जाती है। इसके बाद इमाम जुमे की नमाज़ शुरू कराता है।
इसलिए जुमे के दिन आम तौर पर तरतीब इस तरह होती है-
अज़ान → पहला ख़ुत्बा → थोड़ी देर बैठना → दूसरा ख़ुत्बा → इक़ामत → जुमे की नमाज़
इक़ामत यहाँ नमाज़ शुरू होने का आख़िरी ऐलान है।
जुमे की इक़ामत के बारे में सहीह हदीस
जुमे की अज़ान और ख़ुत्बे के बारे में हज़रत अस-साइब बिन यज़ीद रदिअल्लाहुताला अन्हु से सहीह रिवायत मिलती है।
सहीह अल-बुख़ारी की हदीस 916 के मुताबिक़, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम के ज़माने में जुमे की अज़ान उस वक़्त दी जाती थी जब आप मिम्बर पर बैठते थे। यही अमल हज़रत अबू बक्र रदिअल्लाहुताला अन्हु और हज़रत उमर रदिअल्लाहुताला अन्हु के दौर में भी जारी रहा।
बाद में हज़रत उस्मान रदिअल्लाहुताला अन्हु के दौर में जब लोगों की तादाद बढ़ गई, तो एक अतिरिक्त अज़ान का इंतिज़ाम किया गया।
हवाला – सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 916
https://sunnah.com/bukhari:916
यहाँ एक बात समझना ज़रूरी है कि अतिरिक्त अज़ान और नमाज़ से पहले कही जाने वाली इक़ामत एक ही चीज़ नहीं हैं।
क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम के ज़माने में इक़ामत होती थी?
जी हाँ, नमाज़ के लिए इक़ामत कहना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की सुन्नत से साबित है।
हज़रत अनस रदिअल्लाहुताला अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने हज़रत बिलाल रदिअल्लाहुताला अन्हु को अज़ान के अल्फ़ाज़ दो-दो बार और इक़ामत के अल्फ़ाज़ एक-एक बार कहने का हुक्म दिया, सिवाय “क़द क़ामतिस्सलाह” के, जिसे दो बार कहा जाता था।
हवाला – सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 605–607
https://sunnah.com/bukhari:605
यह रिवायत इक़ामत के अल्फ़ाज़ और उन्हें कहने के एक मशहूर तरीक़े के बारे में अहम दलील है।
इक़ामत में क्या पढ़ा जाता है?
एक मशहूर रिवायत के मुताबिक़ इक़ामत के अल्फ़ाज़ इस तरह हैं-
الله أكبر الله أكبر
अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर
أشهد أن لا إله إلا الله
अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाह
أشهد أن محمدًا رسول الله
अश्हदु अन्ना मुहम्मदर्रसूलुल्लाह
حي على الصلاة
हय्या अलस्सलाह
حي على الفلاح
हय्या अलल्फ़लाह
قد قامت الصلاة
क़द क़ामतिस्सलाह
قد قامت الصلاة
क़द क़ामतिस्सलाह
الله أكبر الله أكبر
अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर
لا إله إلا الله
ला इलाहा इल्लल्लाह
यहाँ ऊपर दिया गया क्रम उस रिवायत के मुताबिक़ है जिसमें इक़ामत के अल्फ़ाज़ एक-एक बार और “क़द क़ामतिस्सलाह” दो बार कहने का ज़िक्र मिलता है।
इक़ामत के अल्फ़ाज़ कितनी बार कहे जाते हैं?
इक़ामत के अल्फ़ाज़ की तादाद के बारे में हदीसों में एक से ज़्यादा तरीक़े मिलते हैं।
हज़रत अनस रदिअल्लाहुताला अन्हु की रिवायत में इक़ामत के अल्फ़ाज़ एक-एक बार और “क़द क़ामतिस्सलाह” दो बार कहने का ज़िक्र है।
दूसरी तरफ़ हज़रत अबू महज़ूरा रदिअल्लाहुताला अन्हु की रिवायत में इक़ामत के 17 phrases का ज़िक्र मिलता है, जिसमें कुछ अल्फ़ाज़ दोहराए जाते हैं।
हवाला – सुनन अबी दाऊद, हदीस 502
https://sunnah.com/abudawud:502
इसलिए अलग-अलग मस्जिदों में इक़ामत के तरीक़े में थोड़ा फ़र्क़ दिखाई दे सकता है। इन फ़र्क़ों को देखकर किसी एक तरीक़े को तुरंत ग़लत कहना मुनासिब नहीं है, क्योंकि दोनों के लिए हदीसों में दलीलें मौजूद हैं।
इक़ामत और अज़ान में क्या फ़र्क़ है?
अज़ान और इक़ामत दोनों नमाज़ से जुड़े अहम ऐलान हैं, लेकिन दोनों का मक़सद अलग है।
अज़ान – लोगों को नमाज़ के लिए बुलाने का ऐलान।
इक़ामत – नमाज़ की जमाअत शुरू होने का ऐलान।
जुमे के दिन अज़ान ख़ुत्बे से पहले होती है और इक़ामत दूसरे ख़ुत्बे के बाद नमाज़ शुरू होने से पहले कही जाती है।
जुमे के दिन अतिरिक्त अज़ान कब शुरू हुई?
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम के ज़माने में जुमे के दिन एक अज़ान का अमल था।
हज़रत अबू बक्र रदिअल्लाहुताला अन्हु और हज़रत उमर रदिअल्लाहुताला अन्हु के दौर में भी यही अमल जारी रहा।
जब हज़रत उस्मान रदिअल्लाहुताला अन्हु के दौर में मदीना में लोगों की तादाद बढ़ गई, तो उन्होंने एक अतिरिक्त अज़ान का इंतिज़ाम कराया ताकि लोगों को पहले से जुमे की नमाज़ की ख़बर हो जाए।
यह बात सहीह बुख़ारी की रिवायत में आती है।
हवाला – सहीह अल-बुख़ारी, हदीस 912 और 916
https://sunnah.com/bukhari:912
इस अतिरिक्त अज़ान को नमाज़ से पहले कही जाने वाली इक़ामत के साथ मिलाना सही नहीं है।
ज़ौराअ क्या था?
हदीस में हज़रत उस्मान रदिअल्लाहुताला अन्हु के दौर की अतिरिक्त अज़ान के लिए ज़ौराअ नाम की जगह का ज़िक्र आता है।
ज़ौराअ मदीना के बाज़ार में एक जगह थी जहाँ से लोगों को जुमे की नमाज़ की जानकारी देने के लिए अतिरिक्त अज़ान दी जाती थी।
इसका मक़सद लोगों को पहले से नमाज़ के लिए तैयार करना था।
इक़ामत कैसे पढ़ी जाती है?
इक़ामत नमाज़ शुरू होने से ठीक पहले कही जाती है।
इसे पढ़ते समय आम तौर पर –
- इक़ामत कहने वाला क़िबला रुख़ होकर खड़ा होता है।
- इक़ामत के अल्फ़ाज़ सही तरतीब से पढ़े जाते हैं।
- इसे अज़ान की तुलना में मुख़्तसर और रवानी के साथ कहा जाता है।
- “क़द क़ामतिस्सलाह” पर यह बताया जाता है कि नमाज़ क़ायम हो चुकी है।
- इक़ामत पूरी होने के बाद इमाम नमाज़ शुरू कराता है।
- जमाअत के लोग सफ़ें सीधी करके नमाज़ के लिए तैयार होते हैं।
इक़ामत को रवानी में पढ़ने या बहुत ज़्यादा खींचने के बजाय नमाज़ शुरू होने के ऐलान के तौर पर साफ़ और वाज़ेह अंदाज़ में कहना चाहिए।
इक़ामत कौन पढ़ सकता है?
आम तौर पर मस्जिद में इक़ामत मुअज़्ज़िन कहता है, क्योंकि अज़ान और इक़ामत की ज़िम्मेदारी आम तौर पर उसी से जुड़ी होती है।
लेकिन इक़ामत कहने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि सिर्फ़ मुअज़्ज़िन ही उसे कह सकता है।
अगर मुअज़्ज़िन मौजूद न हो, तो मस्जिद की जमाअत के इंतिज़ाम के मुताबिक़ कोई दूसरा मुसलमान इक़ामत कह सकता है।
इमाम भी ज़रूरत पड़ने पर खुद इक़ामत कह सकता है।
इसलिए यह समझना सही नहीं कि इक़ामत कहने का हक़ सिर्फ़ एक ख़ास व्यक्ति को ही है।
क्या इक़ामत कहने वाले का वुज़ू होना ज़रूरी है?
इक़ामत कहने वाले के लिए वुज़ू में होना बेहतर और अदब के क़रीब है। लेकिन सिर्फ़ वुज़ू न होने की वजह से इक़ामत को हर हालत में बातिल कहना सही नहीं।
इस मसले में फ़िक़्ही तफ़सील पाई जाती है, इसलिए अपने मज़हब के भरोसेमंद आलिम से रहनुमाई लेना बेहतर है।
क्या इमाम खुद इक़ामत कह सकता है?
जी हाँ। अगर ज़रूरत हो तो इमाम खुद भी इक़ामत कह सकता है।
इक़ामत कहने के लिए मुअज़्ज़िन होना कोई ऐसी शर्त नहीं है कि उसके बिना इक़ामत हो ही नहीं सकती।
आम मस्जिदों में मुअज़्ज़िन इक़ामत कहता है और उसके बाद इमाम नमाज़ की इमामत करता है।
इक़ामत के वक़्त कब खड़ा होना चाहिए?
इस बारे में उलेमा के बीच अलग-अलग राय मिलती है।
कुछ उलेमा इक़ामत शुरू होने पर खड़े होने की बात कहते हैं, जबकि कुछ “हय्या अलस्सलाह” या “क़द क़ामतिस्सलाह” के वक़्त खड़े होने का ज़िक्र करते हैं।
सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में यह हदीस मिलती है कि जब इक़ामत कही जाए तो उस वक़्त तक न खड़े हों जब तक इमाम को न देख लें।
इसलिए मस्जिद के इमाम और वहाँ की जमाअत के आम तरीक़े के मुताबिक़ सफ़ में खड़ा होना ठीक है।
क्या इक़ामत का जवाब देना चाहिए?
इक़ामत सुनने वाले के लिए उसके अल्फ़ाज़ के जवाब के बारे में उलेमा के बीच फ़िक़्ही तफ़सील मिलती है।
कुछ उलेमा इक़ामत के अल्फ़ाज़ का जवाब देने को मुस्तहब मानते हैं, जबकि कुछ के यहाँ अज़ान के जवाब और इक़ामत के जवाब में फ़र्क़ किया जाता है।
इसलिए इस मसले में अपने मज़हब के भरोसेमंद आलिम की रहनुमाई के मुताबिक़ अमल करना बेहतर है।
क़ुरआन में जुमे की नमाज़ का क्या ज़िक्र है?
क़ुरआन मजीद की सूरह अल-जुमुआह में जुमे की नमाज़ के लिए बुलाए जाने का ज़िक्र मिलता है।
सूरह अल-जुमुआह – आयत 9
अरबी-
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نُودِيَ لِلصَّلَاةِ مِن يَوْمِ الْجُمُعَةِ فَاسْعَوْا إِلَىٰ ذِكْرِ اللَّهِ وَذَرُوا الْبَيْعَ ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
हिंदी मतलब-
ऐ ईमान वालों! जब जुमे के दिन नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो अल्लाह की याद की तरफ़ बढ़ो और ख़रीद-फ़रोख़्त छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानते हो।
सूरह- अल-जुमुआह 62:9
क्या इस आयत में इक़ामत का ज़िक्र है?
इस आयत में जुमे की नमाज़ के लिए पुकारे जाने और अल्लाह की याद की तरफ़ जाने का हुक्म है।
लेकिन क़ुरआन में इक़ामत के पूरे अल्फ़ाज़ या ख़ुत्बे के बाद इक़ामत कहने का पूरा तरीक़ा बयान नहीं किया गया है।
इन चीज़ों की तफ़सील हमें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की सुन्नत और हदीसों से मिलती है।
जुमे के ख़ुत्बे की अहमियत
जुमे का ख़ुत्बा मुसलमानों को अल्लाह की याद, तक़वा और नेक अमल की तरफ़ बुलाने का ज़रिया है।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम दो ख़ुत्बे देते थे और उनके बीच थोड़ी देर बैठते थे।
हदीस में हज़रत जाबिर बिन समुरा रदिअल्लाहुताला अन्हु से नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम के दो ख़ुत्बे देने और उनके बीच बैठने का ज़िक्र मिलता है।
ख़ुत्बे के दौरान ख़ामोशी से इमाम की बात सुनना चाहिए और बेवजह बातचीत से बचना चाहिए।
क्या इक़ामत जुमे की नमाज़ का फ़र्ज़ हिस्सा है?
इक़ामत नमाज़ शुरू होने का ऐलान है। जुमे की नमाज़ की शरई शर्तों और इक़ामत के फ़िक़्ही हुक्म को अलग-अलग समझना चाहिए।
इक़ामत के फ़िक़्ही हुक्म के बारे में उलेमा के बीच तफ़सील पाई जाती है। इसलिए बिना किसी फ़िक़्ही तफ़सील के यह कहना कि इक़ामत न होने पर हर हालत में जुमे की नमाज़ बातिल हो जाती है, सही नहीं होगा।
ऐसे मसाइल में अपने मज़हब के भरोसेमंद आलिम से रहनुमाई लेना बेहतर है।
जुमे के ख़ुत्बे के बाद इक़ामत से जुड़े 5 अहम सवाल
1. जुमे के ख़ुत्बे के बाद इक़ामत क्यों कही जाती है?
दूसरा ख़ुत्बा पूरा होने के बाद जुमे की फ़र्ज़ नमाज़ शुरू की जाती है। इक़ामत नमाज़ की जमाअत क़ायम होने का ऐलान है।
2. इक़ामत में क्या पढ़ा जाता है?
इक़ामत में अल्लाहु अकबर, कलिमा-ए-शहादत, हय्या अलस्सलाह, हय्या अलल्फ़लाह, क़द क़ामतिस्सलाह, अल्लाहु अकबर और ला इलाहा इल्लल्लाह पढ़ा जाता है। हदीसों में इनके दोहराने के अलग-अलग तरीक़े भी मिलते हैं।
3. क्या इक़ामत सिर्फ़ मुअज़्ज़िन ही पढ़ सकता है?
नहीं। आम तौर पर मुअज़्ज़िन इक़ामत कहता है, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर कोई दूसरा मुसलमान भी इक़ामत कह सकता है। इमाम भी इक़ामत कह सकता है।
4. क्या जुमे की इक़ामत और आम नमाज़ की इक़ामत अलग होती है?
इक़ामत के बुनियादी अल्फ़ाज़ जुमे और दूसरी फ़र्ज़ नमाज़ों में अलग नहीं होते। जुमे में फ़र्क़ यह है कि इक़ामत से पहले ख़ुत्बा दिया जाता है।
5. क्या इक़ामत के अल्फ़ाज़ हर मस्जिद में एक जैसे होते हैं?
ज़रूरी नहीं। हदीसों में इक़ामत के अल्फ़ाज़ और उन्हें दोहराने के एक से ज़्यादा तरीक़े मिलते हैं। इसलिए अलग-अलग मस्जिदों में मामूली फ़र्क़ हो सकता है।
नतीजा
जुमे के ख़ुत्बे के बाद कही जाने वाली इक़ामत नमाज़ शुरू होने का ऐलान है। नमाज़ के लिए इक़ामत कहना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लमकी सुन्नत से साबित है और इसके अल्फ़ाज़ के बारे में सहीह हदीसों में रहनुमाई मिलती है।
इक़ामत के अल्फ़ाज़ की तादाद और उन्हें दोहराने के तरीक़े में हदीसों की बुनियाद पर कुछ फ़र्क़ मिलता है। इसलिए किसी मस्जिद में अलग तरीक़ा देखकर उसे फ़ौरन ग़लत नहीं कहना चाहिए।
जुमे के दिन इमाम के दो ख़ुत्बे पूरे होने के बाद इक़ामत कही जाती है और फिर जुमे की नमाज़ अदा की जाती है। इक़ामत आम तौर पर मुअज़्ज़िन कहता है, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर कोई दूसरा मुसलमान या इमाम भी इसे कह सकता है।
क़ुरआन मजीद जुमे की नमाज़ के लिए पुकारे जाने पर अल्लाह की याद की तरफ़ जाने का हुक्म देता है, जबकि इक़ामत के अल्फ़ाज़ और नमाज़ के इस तरह के अमल की तफ़सील हमें हदीस और सुन्नत से मिलती है।
अल्लाह तआला हमें दीन की सही समझ अता फ़रमाए और हमें नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की सुन्नत के मुताबिक़ अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
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