बीमारी इंसान के लिए एक मुश्किल इम्तिहान हो सकती है। ऐसे वक़्त में इलाज करवाना, दवा लेना और डॉक्टर की सलाह मानना ज़रूरी है, लेकिन साथ ही एक मोमिन का सबसे बड़ा सहारा अल्लाह से दुआ करना भी है।
इस्लाम हमें सिखाता है कि शिफ़ा देने वाला असल में सिर्फ़ अल्लाह है। दवा और इलाज ज़रिया हो सकते हैं, लेकिन मुकम्मल शिफ़ा अल्लाह के हुक्म से मिलती है।

बीमारी से शिफ़ा की दुआ
Arabic-
اللَّهُمَّ رَبَّ النَّاسِ أَذْهِبِ الْبَأْسَ، اشْفِ أَنْتَ الشَّافِي، لَا شِفَاءَ إِلَّا شِفَاؤُكَ، شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًا
हिंदी में दुआ-
अल्लाहुम्मा रब्बन्नास, अज़्हिबिल बअ्सा, इश्फ़ि अन्तश्शाफ़ी, ला शिफ़ाअ इल्ला शिफ़ाउका, शिफ़ाअन ला युग़ादिरु सक़मा।
Hinglish-
Allahumma Rabban Naas, Adhhibil-Ba’sa, Ishfi Antash-Shaafi, Laa Shifaa’a Illaa Shifaa’uka, Shifaa’an Laa Yughaadiru Saqaman.
हिंदी में मायने-
ऐ अल्लाह! इंसानों के रब, तकलीफ़ और बीमारी को दूर फ़रमा। शिफ़ा अता फ़रमा, क्योंकि तू ही शिफ़ा देने वाला है। तेरी शिफ़ा के अलावा कोई शिफ़ा नहीं। ऐसी मुकम्मल शिफ़ा अता फ़रमा जो बीमारी का कोई असर बाकी न छोड़े।
English Meaning-
O Allah, Lord of mankind, remove the suffering and grant healing. You are the Healer. There is no healing except Your healing—a healing that leaves behind no illness.
इस दुआ की हदीस
हज़रत आयशा रदिअल्लाहु ताला अन्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम बीमार लोगों के लिए शिफ़ा की दुआ करते थे और अल्लाह से बीमारी दूर करने की इल्तिजा करते थे।
यह दुआ सहीह अल-बुखारी में मौजूद है और बीमारी के लिए नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से साबित Authentic दुआओं में शामिल है।
हदीस रेफ़रेंस-
- Sahih al-Bukhari 5742
- Sahih al-Bukhari 5743
- Sahih Muslim 2191
शिफ़ा देने वाला कौन है?
इस्लाम में इलाज और दवा की अहमियत है, लेकिन एक मुसलमान यह यक़ीन रखता है कि असल शिफ़ा अल्लाह के हुक्म से मिलती है।
क़ुरआन में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का क़ौल आता है –
Arabic-
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ
हिंदी में-
व इज़ा मरिज़्तु फ़हुवा यश्फ़ीन।
मायने-
और जब मैं बीमार होता हूँ तो वही मुझे शिफ़ा देता है। – सूरह अश-शुअरा, 26:80
यह आयत हमें याद दिलाती है कि डॉक्टर, दवा और इलाज ज़रूरी ज़रिये हैं, लेकिन शिफ़ा आखिरकार अल्लाह की मशीयत से होती है।
हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीमारी की दुआ
बीमारी और तकलीफ़ के वक़्त हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का वाक़िया मुसलमानों के लिए सब्र और अल्लाह पर भरोसे की बड़ी मिसाल है।
उन्होंने अपने रब से दुआ की-
Arabic-
أَنِّي مَسَّنِيَ الضُّرُّ وَأَنْتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ
हिंदी में-
अन्नी मस्सनियद्दुर्रु व अंता अरहमुर्राहिमीन।
Hinglish-
Anni Massaniyad-Durru Wa Anta Arhamur-Raahimeen.
हिंदी में मायने-
ऐ मेरे रब! मुझे तकलीफ़ पहुँची है और तू सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है।
English Meaning-
Indeed, adversity has touched me, and You are the Most Merciful of those who show mercy.
क़ुरआन रेफ़रेंस: सूरह अल-अंबिया 21:83
इसके बाद अल्लाह ने हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की दुआ क़बूल फ़रमाई और उनकी तकलीफ़ दूर की।
बीमारी में दुआ की अहमियत
बीमारी के दौरान दुआ करना सिर्फ़ शिफ़ा मांगना नहीं है। यह बंदे और उसके रब के बीच भरोसे और तवक्कुल का रिश्ता मज़बूत करता है।
बीमारी के वक़्त एक मोमिन-
- अल्लाह से शिफ़ा मांगता है।
- सब्र करने की कोशिश करता है।
- इलाज करवाता है।
- दवा और डॉक्टर की सलाह पर अमल करता है।
- अल्लाह की रहमत से उम्मीद रखता है।
बीमारी कभी-कभी इंसान को उसकी कमज़ोरी का एहसास दिलाती है और उसे अपने रब के और करीब कर सकती है।
बीमारी से शिफ़ा की दुआ कैसे पढ़ें?
इस दुआ को पूरे यक़ीन और सच्चे दिल से पढ़ें।
आसान तरीका-
- पहले अल्लाह को याद करें।
- अपनी बीमारी और तकलीफ़ के लिए दुआ करें।
- ऊपर दी गई मस्नून दुआ पढ़ें।
- अल्लाह से मुकम्मल शिफ़ा मांगें।
- इलाज और डॉक्टर की सलाह को नज़रअंदाज़ न करें।
- बार-बार अल्लाह से उम्मीद और यक़ीन के साथ दुआ करते रहें।
नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से बीमार व्यक्ति के लिए रुक़्या और शिफ़ा की दुआ करना साबित है।
क्या दुआ के साथ इलाज करवाना चाहिए?
जी हाँ, बिल्कुल।
इस्लाम दुआ और इलाज को एक-दूसरे के खिलाफ़ नहीं रखता। एक मुसलमान अल्लाह से शिफ़ा मांगता है और साथ ही बीमारी के लिए सही मेडिकल इलाज भी करवाता है।
ज़रूरी बात: गंभीर बीमारी, तेज़ दर्द, सांस की तकलीफ़ या किसी मेडिकल इमरजेंसी में सिर्फ़ दुआ पर निर्भर होकर इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए। तुरंत काबिल डॉक्टर या अस्पताल से मदद लें।
दुआ मोमिन का बड़ा सहारा है, जबकि इलाज भी अल्लाह की बनाई हुई दुनिया के ज़रियों में से एक ज़रिया है।
बीमारी में क़ुरआन और दुआ का सहारा
रसूलुल्लाह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से बीमारी के दौरान क़ुरआन की कुछ सूरतों और रुक़्या का अमल भी साबित है। सहीह अल-बुखारी की रिवायत में आता है कि नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम बीमारी के दौरान मुअव्विज़ात पढ़ते थे।
इसलिए मुसलमान बीमारी के दौरान-
- क़ुरआन की तिलावत कर सकता है।
- मस्नून दुआएं पढ़ सकता है।
- अल्लाह से शिफ़ा की इल्तिजा कर सकता है।
- अपने लिए और दूसरों के लिए दुआ कर सकता है।
लेकिन हर अमल Authentic क़ुरआन और सहीह सुन्नत के मुताबिक़ होना चाहिए।
बीमारी में सब्र और उम्मीद
बीमारी का मतलब यह नहीं कि अल्लाह ने इंसान को छोड़ दिया है। मोमिन के लिए मुश्किल वक़्त भी अल्लाह की तरफ़ से इम्तिहान हो सकता है।
हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का वाक़िया हमें सिखाता है कि लंबी तकलीफ़ के बावजूद बंदा अपने रब से उम्मीद नहीं छोड़ता।
सब्र + दुआ + इलाज + तवक्कुल — बीमारी के दौरान एक मुसलमान के लिए बहुत अहम रवैया है।
बीमारी से शिफ़ा की दुआ के फ़ायदे
इस मस्नून दुआ को पढ़ने से एक मोमिन:
- अल्लाह से सीधे शिफ़ा मांगता है।
- अपने दिल में उम्मीद पैदा करता है।
- अपने रब पर भरोसा मज़बूत करता है।
- सुन्नत के मुताबिक़ दुआ करता है।
- बीमारी के मुश्किल वक़्त में अल्लाह को याद करता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इस दुआ में इंसान मानता है कि असली शिफ़ा देने वाला अल्लाह है।
बीमारी से शिफ़ा की दुआ का Authentic Background
यह दुआ कोई नई या बनाई हुई दुआ नहीं है। इसके अल्फ़ाज़ रसूलुल्लाह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से साबित हैं।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायतों में आता है कि नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम बीमार व्यक्ति के लिए दुआ करते हुए अल्लाह से तकलीफ़ दूर करने और ऐसी शिफ़ा देने की इल्तिजा करते थे जिसके बाद बीमारी बाकी न रहे। यह रिवायत सहीह अल-बुखारी और सहीह मुस्लिम में मौजूद है।
इसलिए “Allahumma Rabban-Naas…” बीमारी से शिफ़ा मांगने की सबसे मशहूर और मजबूत Authentic मस्नून दुआओं में से एक है।
बीमारी से शिफ़ा की दुआ – FAQ
1. बीमारी से शिफ़ा की सबसे मशहूर दुआ कौन सी है?
सबसे मशहूर मस्नून दुआ है –
Allahumma Rabban-Naas, Adhhibil-Ba’sa, Ishfi Antash-Shaafi…
यह नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से सहीह रिवायतों में साबित है।
2. क्या यह दुआ अपने लिए पढ़ सकते हैं?
जी हाँ। इंसान अपने लिए भी अल्लाह से शिफ़ा की दुआ कर सकता है और किसी दूसरे बीमार व्यक्ति के लिए भी।
3. बीमारी से शिफ़ा की दुआ कितनी बार पढ़नी चाहिए?
इस दुआ के लिए इस खास रिवायत में कोई तय संख्या बताना सही नहीं होगा। आप इसे बार-बार यक़ीन और इख़्लास के साथ पढ़ सकते हैं।
4. क्या सिर्फ़ दुआ से इलाज छोड़ देना चाहिए?
नहीं। दुआ के साथ सही मेडिकल इलाज और डॉक्टर की सलाह लेना भी ज़रूरी है। इस्लाम इलाज के ज़रियों को अपनाने से नहीं रोकता।
5. क्या हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की दुआ बीमारी में पढ़ सकते हैं?
जी हाँ। सूरह अल-अंबिया 21:83 में हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की दुआ मौजूद है, जो तकलीफ़ और मुश्किल के वक़्त अल्लाह की रहमत की तरफ़ रुजू करने की बहुत खूबसूरत मिसाल है।
बीमारी से शिफ़ा की दुआ – नतीजा
बीमारी इंसान के लिए मुश्किल वक़्त हो सकती है, लेकिन एक मोमिन को कभी अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए।
बीमारी से शिफ़ा की दुआ हमें याद दिलाती है कि-
अल्लाह ही असल शिफ़ा देने वाला है।
दुआ करें, इलाज करवाएं, सब्र रखें और अपने रब पर भरोसा रखें।
अल्लाह सुबहाना व तआला हर बीमार इंसान को मुकम्मल शिफ़ा अता फ़रमाए। आमीन।
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