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क्या औरतें कब्रिस्तान जा सकती हैं? 7 अहम इस्लामी बातें Can women go to graveyard in islam

क्या औरतें कब्रिस्तान जा सकती हैं?- Can women go to graveyard in islam

क्या औरतें कब्रिस्तान जा सकती हैं? (Can Women Go to Graveyard in Islam) यह सवाल अक्सर मुस्लिम घरों में उठता है, खासकर जब किसी औरत के माता-पिता, पति, भाई या किसी दूसरे करीबी रिश्तेदार का इंतकाल हो जाता है। ऐसे में वह अपने मरहूम रिश्तेदार की कब्र पर जाना चाहती है और उनके लिए दुआ करना चाहती है।

लेकिन क्या इस्लाम में औरतों को कब्रिस्तान जाने की इजाज़त है? क्या औरतों का कब्रिस्तान जाना हराम है या जायज़? इस बारे में नबी करीम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की हदीस में क्या बताया गया है?

इस्लाम में कब्रिस्तान की ज़ियारत का एक अहम मकसद मौत और आख़िरत को याद करना तथा मरहूम लोगों के लिए मग़फिरत की दुआ करना है। हालांकि, औरतों के कब्रिस्तान जाने के मसले पर उलमा के बीच अलग-अलग राय पाई जाती है।

इस लेख में हम कुरआन, सहीह हदीस और उलमा की राय की रोशनी में जानेंगे कि क्या औरतें कब्रिस्तान जा सकती हैं और इस बारे में इस्लाम की सही तालीम क्या है।

1. क्या औरतें कब्रिस्तान जा सकती हैं? Can women go to graveyard in islam

इस सवाल का जवाब देने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि इस्लामी उलमा के बीच औरतों की कब्रिस्तान की ज़ियारत को लेकर इख्तिलाफ़ है।

आम तौर पर इस मसले में तीन तरह की राय पाई जाती हैं-

  1. पहली राय: कुछ उलमा के मुताबिक औरतों को कब्रिस्तान जाने की इजाज़त नहीं है। वे इस सिलसिले में उन हदीस को दलील बनाते हैं जिनमें कब्रों की ज़ियारत करने वाली औरतों के लिए सख़्त चेतावनी आई है।
  2. दूसरी राय: कुछ उलमा इसे मकरूह समझते हैं, खासकर जब बार-बार कब्रिस्तान जाने या ग़म को ताज़ा करने का मामला हो।
  3. तीसरी राय: कुछ उलमा के मुताबिक औरतें भी शर्तों के साथ कब्रिस्तान जा सकती हैं, बशर्ते वहाँ कोई नाजायज़ काम न हो और वे सब्र व अदब का ख़याल रखें।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इस मसले पर सभी उलमा की एक ही राय है।

औरतों के कब्रिस्तान जाने के बारे में फैसला करते समय अपने भरोसेमंद आलिम या मुफ़्ती से अपनी हालत और जिस फ़िक़्ही राय पर आप अमल करती हैं, उसके मुताबिक रहनुमाई लेना बेहतर है।

2. औरतों के कब्रिस्तान जाने के बारे में हदीस

इस मसले को समझने के लिए कुछ अहम हदीस पर गौर करना ज़रूरी है।

हदीस 1- कब्रिस्तान जाने वाली औरतों के बारे में चेतावनी

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने फरमाया-

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ (सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम) لَعَنَ زَوَّارَاتِ الْقُبُورِ

हिंदी मतलब-

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने उन औरतों के लिए लानत फरमाई जो कब्रों की ज़ियारत करती हैं।

हदीस का हवाला-

यह हदीस उन उलमा की अहम दलील है जो औरतों के कब्रिस्तान जाने को मना करते हैं।

इस हदीस में इस्तेमाल हुआ शब्द ‘ज़व्वारात’ भी काबिले गौर है। कुछ उलमा इसकी तशरीह बार-बार कब्रिस्तान जाने वाली औरतों के तौर पर करते हैं, जबकि दूसरे उलमा इसे आम मुमानअत की दलील मानते हैं।

इमाम तिर्मिज़ी ने इसी हदीस के सिलसिले में यह भी बताया है कि कुछ अहले इल्म के मुताबिक कब्रिस्तान जाने की इजाज़त मिलने के बाद मर्द और औरतें दोनों इसमें शामिल हैं, जबकि दूसरे अहले इल्म ने औरतों के लिए इसे मकरूह माना।

हदीस 2- कब्रिस्तान जाने की इजाज़त

हज़रत बुरैदा रज़ियल्लाहु अन्हु अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने फरमाया-

كُنْتُ نَهَيْتُكُمْ عَنْ زِيَارَةِ الْقُبُورِ فَقَدْ أُذِنَ لِمُحَمَّدٍ فِي زِيَارَةِ قَبْرِ أُمِّهِ فَزُورُوهَا فَإِنَّهَا تُذَكِّرُ الْآخِرَةَ

हिंदी मतलब-

मैंने तुम्हें पहले कब्रों की ज़ियारत से मना किया था, लेकिन अब मुझे अपनी माँ की कब्र की ज़ियारत की इजाज़त दे दी गई है। इसलिए तुम भी कब्रों की ज़ियारत करो, क्योंकि यह तुम्हें आख़िरत की याद दिलाती है।

हदीस का हवाला-

यह हदीस कब्रिस्तान की ज़ियारत के आम मकसद को बताती है। कब्रों की ज़ियारत इंसान को मौत और आख़िरत की याद दिलाती है।

हालांकि, इस हदीस में औरतों के लिए अलग से कोई साफ़ हुक्म नहीं दिया गया है। इसी वजह से उलमा ने दूसरी हदीसों के साथ इसे मिलाकर अलग-अलग राय कायम की है।

हदीस 3- हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम आपके घर होते, तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम रात के आखिरी हिस्से में मदीना के कब्रिस्तान बक़ीअ जाते और वहाँ के लोगों के लिए दुआ करते थे।

السَّلَامُ عَلَيْكُمْ دَارَ قَوْمٍ مُؤْمِنِينَ

हिंदी मतलब-

ऐ मोमिन लोगों के घराने! तुम पर सलामती हो।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम कब्रिस्तान के लोगों के लिए मग़फिरत की दुआ भी करते थे।

हदीस का हवाला-

यह रिवायत कब्रिस्तान में सलाम करने और वहाँ दुआ करने का तरीका बताती है। हालांकि, इसमें यह नहीं कहा गया कि हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा खुद कब्रिस्तान गई थीं।

3. कुरआन में कब्रिस्तान जाने के बारे में क्या है?

कुरआन मजीद में औरतों के कब्रिस्तान जाने की इजाज़त या मनाही के बारे में कोई ऐसी सीधी आयत नहीं है जो इस मसले का फैसला कर दे।

लेकिन कुरआन में मौत और कब्रों के ज़िक्र के ज़रिए इंसान को आख़िरत की याद दिलाई गई है।

सूरह अत-तकासुर

Arabic-

حَتَّىٰ زُرْتُمُ الْمَقَابِرَ

हिंदी मतलब-

यहाँ तक कि तुम कब्रों तक जा पहुँचे।

हवाला- सूरह अत-तकासुर, 102:2

इस आयत में दुनिया की दौलत और ज़्यादा से ज़्यादा हासिल करने की होड़ में लगे रहने वाले इंसानों को आगाह किया गया है कि यह सिलसिला मौत आने तक जारी रहता है।

यह आयत कब्रिस्तान की ज़ियारत के बारे में औरतों या मर्दों के लिए कोई अलग हुक्म नहीं देती, बल्कि मौत की हक़ीक़त और आख़िरत की याद दिलाती है।

4. क्या औरत अपने मरहूम रिश्तेदार की कब्र पर जा सकती है?

अगर किसी औरत के वालिद, वालिदा, शौहर, भाई या किसी दूसरे करीबी रिश्तेदार का इंतकाल हो जाए, तो उसके दिल में उनकी कब्र पर जाने की ख्वाहिश होना एक फितरी बात है।

लेकिन सिर्फ रिश्तेदारी या मोहब्बत की वजह से इस मसले का शरई हुक्म नहीं बदल जाता।

जो उलमा औरतों के लिए कब्रिस्तान जाने को जायज़ मानते हैं, उनके मुताबिक औरत अपने मरहूम रिश्तेदार की कब्र पर जाकर उनके लिए दुआ कर सकती है, बशर्ते इस्लामी अदब का ख़याल रखा जाए।

जबकि मना करने वाले उलमा के मुताबिक रिश्तेदार की कब्र होने से भी इसकी इजाज़त नहीं मिलती।

इसलिए किसी औरत को इस मसले में अपने भरोसेमंद आलिम से रहनुमाई लेनी चाहिए।

5. औरतें कब्रिस्तान जाएँ तो किन बातों का ख़याल रखें?

जो उलमा शर्तों के साथ औरतों के कब्रिस्तान जाने को जायज़ मानते हैं, उनके मुताबिक इन बातों का ख़याल रखना चाहिए-

  1. पर्दे का ख़याल: कब्रिस्तान जाते समय इस्लामी हिजाब और पर्दे का एहतिमाम करें।
  2. सब्र करें: मरहूम की याद में रोना फितरी बात है, लेकिन चीखना-चिल्लाना, नोहा करना और अल्लाह की तक़दीर पर शिकायत करना जायज़ नहीं।
  3. बार-बार जाने से बचें: कब्रिस्तान को ग़म ताज़ा करने या किसी खास रस्म की जगह न बनाएँ।
  4. सिर्फ अल्लाह से दुआ करें: मरहूम के लिए मग़फिरत और रहमत की दुआ अल्लाह से माँगें।
  5. कब्रों का अदब करें: कब्र पर बैठना, उसे रौंदना या उसके साथ बेअदबी करना मुनासिब नहीं है।

ध्यान रहे कि ये उन उलमा की बताई हुई एहतियाती शर्तें हैं जो औरतों के लिए कब्रिस्तान की ज़ियारत को जायज़ मानते हैं। जो उलमा इसे मना करते हैं, उनकी राय में इन शर्तों का पालन करने से भी ज़ियारत जायज़ नहीं हो जाती।

6. कब्रिस्तान में क्या दुआ पढ़ें?

जो लोग कब्रिस्तान की ज़ियारत को जायज़ मानते हैं, उनके लिए वहाँ दाखिल होते समय मरहूम लोगों को सलाम करना और उनके लिए दुआ करना सुन्नत से साबित है।

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से कब्रिस्तान में पढ़े जाने वाले सलाम और दुआ के अल्फ़ाज़ मिलते हैं।

Arabic-

السَّلَامُ عَلَىٰ أَهْلِ الدِّيَارِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُسْلِمِينَ، وَيَرْحَمُ اللَّهُ الْمُسْتَقْدِمِينَ مِنَّا وَالْمُسْتَأْخِرِينَ، وَإِنَّا إِنْ شَاءَ اللَّهُ بِكُمْ لَلَاحِقُونَ

हिंदी में पढ़ने का तरीका-

अस्सलामु अलै अहलिद दियारि मिनल मोमिनीना वल मुस्लिमीन, व यरहमुल्लाहुल मुस्तक़दीमीना मिन्ना वल मुस्तअखिरीन, व इन्ना इंशाअल्लाहु बिकुम लला हिक़ून।

हिंदी मतलब-

ऐ मोमिन और मुसलमान घरों में रहने वालो! तुम पर सलामती हो। अल्लाह हममें से पहले जाने वालों और बाद में जाने वालों पर रहम फरमाए। और बेशक हम भी इंशाअल्लाह तुमसे मिलने वाले हैं।

हवाला- सहीह मुस्लिम: 974

यह दुआ मरहूम लोगों के लिए सलाम और रहमत की दुआ है।

7. कब्रिस्तान की ज़ियारत का असल मकसद

इस्लाम में कब्रिस्तान की ज़ियारत का मकसद सिर्फ अपने मरहूम रिश्तेदारों को याद करना नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी और आख़िरत के बारे में गौर करना भी है।

कब्रिस्तान की ज़ियारत से इंसान को कुछ अहम बातें याद आती हैं-

इसलिए कब्रिस्तान की ज़ियारत को इस्लाम में एक अहम नसीहत और इबरत का ज़रिया बताया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. क्या इस्लाम में औरतों का कब्रिस्तान जाना हराम है?

इस मसले पर उलमा के बीच इख्तिलाफ़ है। कुछ उलमा इसे हराम मानते हैं, कुछ मकरूह और कुछ शर्तों के साथ जायज़ मानते हैं। इसलिए इसे सभी उलमा का इत्तिफाक़ी फैसला नहीं कहा जा सकता।

2. क्या औरत अपने माँ-बाप की कब्र पर जा सकती है?

कुछ उलमा के मुताबिक औरत अपने माँ-बाप की कब्र पर जा सकती है, जबकि दूसरे उलमा इसे मना करते हैं। सिर्फ रिश्तेदारी होने से शरई हुक्म नहीं बदलता। अपने भरोसेमंद आलिम से मसले की रहनुमाई लें।

3. क्या औरतें ईद या जुमे के दिन कब्रिस्तान जा सकती हैं?

कुरआन और सहीह हदीस में औरतों के लिए ईद या जुमे के दिन कब्रिस्तान जाने की कोई खास इजाज़त तय नहीं की गई है। इस मामले में भी वही फ़िक़्ही इख्तिलाफ़ लागू होता है। किसी खास दिन को ज़रूरी या खास सवाब वाला समझने के लिए दलील होना ज़रूरी है।

4. क्या औरतें कब्रिस्तान में रो सकती हैं?

किसी अपने के इंतकाल पर आँसू बहाना और दिल का ग़म महसूस करना इंसानी फितरत है। लेकिन चीखना-चिल्लाना, नोहा करना, कपड़े फाड़ना और अल्लाह की तक़दीर पर शिकायत करना मना है।

5. क्या औरत घर से ही मरहूम के लिए दुआ कर सकती है?

जी हाँ। औरत घर पर रहकर भी अपने मरहूम रिश्तेदारों के लिए मग़फिरत और रहमत की दुआ कर सकती है। दुआ करने के लिए कब्रिस्तान जाना ज़रूरी नहीं है। अल्लाह सुब्हानवा तआला हर जगह से की गई दुआ सुनते है।

नतीजा

इस्लाम में औरतों के कब्रिस्तान जाने का मसला ऐसा है जिसमें उलमा के बीच इख्तिलाफ़ मौजूद है। कुछ उलमा हदीस में आई चेतावनी की बुनियाद पर इसे मना करते हैं, जबकि कुछ उलमा कब्रिस्तान की आम इजाज़त वाली हदीस को देखते हुए शर्तों के साथ इसकी इजाज़त देते हैं।

इसलिए किसी एक राय को सभी मुसलमानों पर लागू करना सही नहीं होगा। बेहतर है कि अपने भरोसेमंद आलिम से रहनुमाई ली जाए और हर हाल में सब्र, हिजाब और इस्लामी अदब का ख़याल रखा जाए।

अल्लाह तआला हमारे तमाम मरहूम मुसलमानों की मग़फिरत फरमाए, उनकी कब्रों को रौशन फरमाए और हमें आख़िरत की तैयारी करने की तौफीक़ अता फरमाए।

आमीन या रब्बुल आलमीन।

हदीस और रिसर्च के हवाले – 
  1. जामे तिर्मिज़ी 1056 – औरतों के कब्रिस्तान जाने के बारे में हदीस।
  2. जामे तिर्मिज़ी 1054 – कब्रिस्तान की ज़ियारत की इजाज़त।
  3. सहीह मुस्लिम 974 – कब्रिस्तान में सलाम और दुआ।
  4. सहीह मुस्लिम 976 – मौत की याद दिलाने के लिए कब्रों की ज़ियारत।
  5. सहीह मुस्लिम 977 – कब्रिस्तान की ज़ियारत की आम इजाज़त।
  6. कुरआन – सूरह अत-तकासुर 102:1-2।

अहम नोट- यह आर्टिकल मौजूद हदीस और उलमा की राय पर आधारित जानकारी के लिए है। किसी निजी शरई फैसले के लिए काबिल मुफ़्ती से राब्ता क़ायम करें।

जज़ाकल्लाह खैर। अल्लाह सुब्हानवताला इस कोशिश में हुई छोटी बड़ी गलती को माफ़ करे  – आमीन ।

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