Do Sajdon Ke Darmiyan Ki Dua – दोनों सज्दों के बीच की दुआ
नमाज़ में पहले सज्दे से उठकर दूसरे सज्दे में जाने से पहले बैठते हैं। इस दौरान अल्लाह से मग़फ़िरत, रहमत, हिदायत और रिज़्क़ माँगने की दुआ पढ़ना नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की सुन्नत से साबित है।
इस लेख में आप दो सज्दों के दरमियान की दुआ अरबी, हिंदी में पढ़ने का तरीका और Hinglish में जानेंगे। साथ ही इसका मतलब, हदीस का हवाला और इससे जुड़ी ज़रूरी बातें भी पढ़ेंगे।
1. दोनों सज्दों के बीच की दुआ
अरबी में दुआ
اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي، وَارْحَمْنِي، وَاجْبُرْنِي، وَاهْدِنِي، وَارْزُقْنِي
हिंदी में पढ़ने का तरीका
अल्लाहुम्मग़फ़िर ली, वरहमनी, वज्बुरनी, वह्दिनी, वरज़ुक़नी।
Hinglish में दुआ
Allahummaghfir li, warhamni, wajburni, wahdini, warzuqni.
दुआ का हिंदी में मतलब
ऐ अल्लाह! मुझे माफ़ फ़रमा, मुझ पर रहम फ़रमा, मेरी कमी पूरी फ़रमा, मुझे हिदायत दे और मुझे रिज़्क़ अता फ़रमा।
Dua Meaning in English
O Allah, forgive me, have mercy on me, make up for my shortcomings, guide me, and provide sustenance for me.
ध्यान दें: इस दुआ के अल्फ़ाज़ अलग-अलग रिवायतों में थोड़े फ़र्क़ के साथ आए हैं। ऊपर दी गई दुआ जामे तिर्मिज़ी की हदीस नंबर 284 में बयान हुई रिवायत के मुताबिक़ है।
2. दुआ की हदीस और हवाला
हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम दोनों सज्दों के बीच यह दुआ पढ़ते थे-
हदीस का हवाला-
- किताब- जामे तिर्मिज़ी, हदीस 284
- सुनन अबू दाऊद, हदीस 850
- सुनन इब्न माजा, हदीस 898
इन रिवायतों में दुआ के अल्फ़ाज़ में कुछ अंतर मिलता है। हदीस की तख़रीज और दर्जे की तफ़सील के लिए मूल रिवायत देखें। जामे तिर्मिज़ी की इस रिवायत को कई मुहद्दिसीन ने सहीह या हसन दर्जा दिया है।
हवाला – जामे तिर्मिज़ी 284 — हदीस और अरबी मतन | सुनन अबू दाऊद 850 — हदीस का hawala
3. इस दुआ का मतलब और अहमियत
इस छोटी-सी दुआ में बंदा अल्लाह से पाँच अहम चीज़ें माँगता है।
1. मग़फ़िरत — اغْفِرْ لِي
अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगना और उसकी बख़्शिश की उम्मीद रखना।
2. रहमत — وَارْحَمْنِي
अल्लाह की रहमत और मेहरबानी तलब करना।
3. कमी पूरी करना — وَاجْبُرْنِي
अपनी कमियों की भरपाई, बेहतरी और ज़रूरतों की पूर्ति के लिए अल्लाह से मदद माँगना।
4. हिदायत — وَاهْدِنِي
सीधे रास्ते पर चलने, सही और ग़लत में फ़र्क़ समझने और नेक अमल करने की तौफ़ीक़ माँगना।
5. रिज़्क़ — وَارْزُقْنِي
अल्लाह से रिज़्क़ और ज़रूरतों की पूर्ति माँगना। रिज़्क़ में हलाल कमाई और दूसरी नेमतें भी शामिल हैं।
4. यह दुआ कब और कैसे पढ़ें?
नमाज़ की हर रकअत में पहले सज्दे के बाद बैठकर, दूसरे सज्दे से पहले यह दुआ पढ़ें।
इसका आसान तरीका:
- पहले सज्दे में जाएँ और सज्दे का ज़िक्र पढ़ें।
- सज्दे से उठकर इत्मीनान से बैठें।
- बैठने की हालत में दोनों सज्दों के बीच की दुआ पढ़ें।
- फिर दूसरे सज्दे में जाएँ।
दुआ पढ़ते समय जल्दबाज़ी न करें। बैठने में इत्मीनान रखें और नमाज़ के अरकान सही तरीके से अदा करें।
5. क्या छोटी दुआ भी पढ़ सकते हैं?
जी हाँ। दोनों सज्दों के बीच यह छोटी दुआ भी हदीस में आई है-
अरबी
رَبِّ اغْفِرْ لِي
हिंदी में पढ़ने का तरीका
रब्बिग़फ़िर ली।
Hinglish
Rabbighfir li.
मतलब
ऐ मेरे रब! मुझे माफ़ फ़रमा।
हदीस का हवाला – सुनन अबू दाऊद, हदीस 874; सुनन इब्न माजा, हदीस 897 में दोनों सज्दों के बीच “रब्बिग़फ़िर ली” दो बार कहने की रिवायत मिलती है।
हवाला : दोनों सज्दों के बीच की दुआ और रिवायतें
इस दुआ की फ़ज़ीलत
- मग़फ़िरत की दुआ- इसमें अल्लाह से गुनाहों की माफ़ी माँगी जाती है।
- रहमत की दरख़्वास्त- बंदा अल्लाह की मेहरबानी तलब करता है।
- हिदायत की माँग- यह दुआ सही रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ माँगने की याद दिलाती है।
- रिज़्क़ की दुआ- इसमें अल्लाह से रिज़्क़ अता करने की दरख़्वास्त शामिल है।
- सुन्नत पर अमल- नमाज़ में इस दुआ को पढ़ना नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से साबित है।
इसकी ख़ास फ़ज़ीलत के बारे में वही बात कहनी चाहिए जो क़ुरआन या सहीह हदीस से साबित हो। इस दुआ के लिए कोई ख़ास गिनती या दुनिया में किसी निश्चित नतीजे की गारंटी बताना सही नहीं होगा।
क़ुरआन से क्या हवाला है?
दोनों सज्दों के बीच पढ़ी जाने वाली इस ख़ास दुआ के यही अल्फ़ाज़ किसी विशेष क़ुरआनी आयत के रूप में नहीं आए हैं। इसका मुख्य हवाला हदीस की किताबों में मिलता है।
हालाँकि, अल्लाह से मग़फ़िरत और रहमत माँगने की अहमियत क़ुरआन में भी बयान हुई है।
क़ुरआन का हवाला – सूरह अल-बक़रह, 2:201 में दुनिया और आख़िरत की भलाई माँगने की दुआ आती है-
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
हिंदी में पढ़ने का तरीका-
रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या हसनतं, व फ़िल आख़िरति हसनतं, वक़िना अज़ाबन्नार।
मतलब- ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई दे, आख़िरत में भलाई दे और हमें आग के अज़ाब से बचा।
यह आयत दुआ की आम अहमियत समझाती है; इसे दोनों सज्दों के बीच की ख़ास दुआ का हवाला न समझें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQs
1. Do sajdon ke darmiyan ki dua kya hai?
दोनों सज्दों के बीच पढ़ी जाने वाली दुआ है: “अल्लाहुम्मग़फ़िर ली, वरहमनी, वज्बुरनी, वह्दिनी, वरज़ुक़नी।” यह जामे तिर्मिज़ी 284 में बयान हुई है।
2. क्या दोनों सज्दों के बीच दुआ पढ़ना ज़रूरी है?
इस ज़िक्र के हुक्म की तफ़सील फ़िक़्ही राय के मुताबिक़ अलग हो सकती है। इसे नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की सुन्नत समझकर पढ़ें और नमाज़ के ज़रूरी अरकान का ध्यान रखें।
3. क्या सिर्फ़ रब्बिग़फ़िर ली पढ़ सकते हैं?
जी हाँ, “रब्बिग़फ़िर ली” के अल्फ़ाज़ भी हदीस में आए हैं। सुनन अबू दाऊद 874 में इसे दोनों सज्दों के बीच दो बार कहने की रिवायत है।
4. क्या यह दुआ हर रकअत में पढ़नी चाहिए?
यह दुआ नमाज़ की हर रकअत में दोनों सज्दों के बीच पढ़ी जा सकती है। इसे इत्मीनान से पढ़ें और नमाज़ के तरीके का ध्यान रखें।
5. क्या दोनों सज्दों के बीच हिंदी में दुआ पढ़ सकते हैं?
नमाज़ के अंदर अपनी भाषा में दुआ करने के हुक्म में फ़िक़्ही तफ़सील है। इसलिए नमाज़ के दौरान हदीस से साबित अरबी दुआ याद करके पढ़ना बेहतर है। अगर अरबी याद नहीं है, तो अपने भरोसेमंद आलिम से अपने हालात के मुताबिक़ मसला पूछें।
ख़ुलासा
दोनों सज्दों के बीच की दुआ नमाज़ का एक अहम सुन्नत ज़िक्र है। इसके ज़रिए बंदा अल्लाह से मग़फ़िरत, रहमत, अपनी कमियों की भरपाई, हिदायत और रिज़्क़ माँगता है। दुआ के अल्फ़ाज़ याद करें, उनका मतलब समझें और नमाज़ में इत्मीनान बनाए रखें।
अल्लाह हमें नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की सुन्नत के मुताबिक़ नमाज़ अदा करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
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