अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ
इस्लाम में दुआ एक बहुत बड़ी इबादत है। बंदा जब अपने रब से अपनी ज़रूरत, परेशानी, मग़फ़िरत, रहमत और भलाई के लिए मांगता है तो वह अपने रब के सामने अपनी बेबसी और अल्लाह की क़ुदरत का इकरार करता है।
अज़ान और इक़ामत के बीच का वक़्त दुआ के लिए बहुत अहम माना गया है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने इस वक़्त की दुआ के बारे में फ़रमाया –
“अज़ान और इक़ामत के बीच की दुआ रद्द नहीं की जाती।”
यह रिवायत हज़रत अनस बिन मालिक रदिअल्लाहुताला अन्हु से मर्वी है। जामे अत-तिर्मिज़ी 212 में इमाम तिर्मिज़ी ने इसे हसन कहा है, जबकि अबू दाऊद 521 की रिवायत को शैख़ अल-अलबानी ने सहीह कहा है।
इसलिए मुसलमान को चाहिए कि अज़ान और इक़ामत के बीच के इस ख़ास वक़्त को ग़फ़लत में न गुज़ारे, बल्कि अल्लाह से दिल खोलकर दुआ करे।
अज़ान और इक़ामत के बीच कौन-सी दुआ पढ़ें?
सबसे अहम बात यह है कि अज़ान और इक़ामत के बीच पढ़ने के लिए कोई एक खास दुआ सहीह हदीस में तय नहीं की गई है।
इसलिए इस वक़्त आप अपनी जायज़ ज़रूरतों के लिए अल्लाह से अपनी जबान में भी दुआ कर सकते हैं। आप मग़फ़िरत, सेहत, रिज़्क़, औलाद, घरवालों, ईमान, हिदायत, परेशानियों से निजात और आख़िरत की भलाई मांग सकते हैं।
इस वक़्त पढ़ने के लिए क़ुरआन में मौजूद एक बहुत खूबसूरत दुआ यह है –
अरबी दुआ-
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
हिंदी में पढ़ने का तरीका-
रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या हसनतं व फ़िल-आख़िरति हसनतं वक़िना अज़ाबन्नार।
Hinglish-
Rabbana atina fid-dunya hasanatan wa fil-akhirati hasanatan wa qina azaban-nar.
हिंदी में मतलब-
ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई अता फ़रमा, आख़िरत में भी भलाई अता फ़रमा और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।
English Meaning-
Our Lord, give us good in this world and good in the Hereafter, and protect us from the punishment of the Fire.
यह दुआ क़ुरआन में सूरह अल-बक़रह, 2:201 में आई है।
इसके अलावा आप अपनी ज़ुबान में भी दुआ कर सकते हैं। मसलन-
“या अल्लाह! मेरे गुनाहों को माफ़ फ़रमा, मेरे ईमान की हिफ़ाज़त फ़रमा, मेरे घरवालों पर रहमत फ़रमा, मेरी परेशानियां दूर फ़रमा, मुझे हलाल रिज़्क़ अता फ़रमा और दुनिया व आख़िरत में मेरे लिए भलाई लिख दे। आमीन।”
यह कोई तयशुदा मस्नून दुआ नहीं है, बल्कि अपनी जायज़ ज़रूरत के लिए की जाने वाली आम दुआ की एक मिसाल है।
इस वक़्त दुआ की क्या फ़ज़ीलत है?
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने फ़रमाया-
لَا يُرَدُّ الدُّعَاءُ بَيْنَ الْأَذَانِ وَالْإِقَامَةِ
ला युरद्दुद-दुआउ बैनल-अज़ानि वल-इक़ामह।
मायने –
अज़ान और इक़ामत के बीच की दुआ रद्द नहीं की जाती।
यह हदीस हज़रत अनस रदिअल्लाहुताला अन्हु से मर्वी है और जामे अत-तिर्मिज़ी 212 में दर्ज है। इमाम तिर्मिज़ी ने इसे हसन कहा है। इसी अर्थ की रिवायत सुनन अबी दाऊद 521 में भी मौजूद है, जिसे अल-अलबानी ने सहीह कहा है।
इस हदीस से पता चलता है कि अज़ान और इक़ामत के बीच का वक़्त दुआ के लिए बहुत अहम है।
दुआ की कबूलियत की उम्मीद क्यों रखें?
अल्लाह सुब्हानवा तआला क़ुरआन में फरमाते है-
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ
व क़ाला रब्बुकुमुद्उनी अस्तजिब लकुम।
मायने –
“और तुम्हारे रब ने फ़रमाया – मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी दुआ क़बूल करूँगा।”
यह सूरह ग़ाफ़िर, 40:60 में आया है।
इसलिए मुसलमान को दुआ करते समय अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए।
अज़ान के बाद और इक़ामत से पहले क्या करना चाहिए?
अज़ान सुनने के बाद पहले अज़ान का जवाब देना और फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम पर दरूद भेजना मस्नून है। इसके बाद अज़ान के बाद वाली मशहूर दुआ पढ़ी जा सकती है।
फिर इक़ामत होने से पहले जो वक़्त मिले, उसमें दुआ करना चाहिए।
इस वक़्त आप –
- अपने गुनाहों की मग़फ़िरत मांग सकते हैं।
- अपने और अपने घरवालों के लिए दुआ कर सकते हैं।
- हलाल और पाक रिज़्क़ मांग सकते हैं।
- बीमारी और परेशानी से निजात मांग सकते हैं।
- ईमान और हिदायत की दुआ कर सकते हैं।
- अपने बच्चों के लिए नेक ज़िंदगी की दुआ कर सकते हैं।
- दुनिया और आख़िरत की भलाई मांग सकते हैं।
- उम्मत के लिए भलाई और अमन की दुआ कर सकते हैं।
दुआ के लिए अरबी ज़रूरी नहीं है। अगर किसी शख़्स को अरबी दुआ याद नहीं है तो वह अपनी ज़ुबान में भी अल्लाह से अपनी जायज़ ज़रूरत मांग सकता है।
क्या कोई एक खास दुआ पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं।
अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ करने की फ़ज़ीलत सहीह / हसन रिवायत से साबित है, लेकिन इस पूरे वक़्त के लिए कोई एक खास दुआ ऐसी नहीं है जिसे हर मुसलमान पर पढ़ना ज़रूरी बताया गया हो।
इसलिए इंटरनेट या सोशल मीडिया पर मिलने वाली किसी भी दुआ को “अज़ान और इक़ामत के बीच की एकमात्र मस्नून दुआ” कहना सही नहीं होगा, जब तक उसके लिए सहीह दलील मौजूद न हो।
आप क़ुरआन की दुआएं, सहीह हदीस से साबित दुआएं और अपनी जायज़ ज़रूरतों के लिए अपनी ज़ुबान में दुआ कर सकते हैं।
अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ करने का आसान तरीका
इस वक़्त को बहुत आसान तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है:
1. अज़ान को ध्यान से सुनें और मुअज़्ज़िन का जवाब दें।
2. अज़ान के बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम पर दरूद भेजें।
3. अज़ान के बाद की मस्नून दुआ पढ़ें।
4. इसके बाद अपने रब से अपनी जायज़ ज़रूरतों के लिए दुआ करें।
5. इक़ामत शुरू होने पर नमाज़ के लिए तैयार हो जाएं।
सबसे अहम बात यह है कि दुआ दिल से और उम्मीद के साथ की जाए।
दुआ करते समय किन बातों का ख़याल रखें?
दुआ अल्लाह से मांगने का नाम है, इसलिए बंदे को अपने रब पर भरोसा रखना चाहिए।
दुआ में –
- सिर्फ़ जायज़ चीज़ मांगें।
- गुनाह या किसी पर ज़ुल्म की दुआ न करें।
- अल्लाह की रहमत से मायूस न हों।
- अपनी दुआ को सिर्फ़ दुनिया तक सीमित न रखें।
- अपने माता-पिता और घरवालों के लिए भी दुआ करें।
- आख़िरत की कामयाबी को भी अपनी दुआ में शामिल करें।
याद रखें, दुआ का मतलब यह नहीं कि इंसान अपनी पसंद का नतीजा हर हाल में हासिल कर ले। बंदा अल्लाह से मांगता है और अल्लाह अपनी हिकमत के मुताबिक़ फैसला फ़रमाता है।
अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ से जुड़े 5 अहम सवाल
1. क्या अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ क़बूल होती है?
हदीस में आया है कि अज़ान और इक़ामत के बीच की दुआ रद्द नहीं की जाती। यह रिवायत हज़रत अनस रदिअल्लाहुताला अन्हु से मर्वी है।
2. क्या इस वक़्त सिर्फ़ अरबी में दुआ करनी चाहिए?
नहीं। अपनी जायज़ ज़रूरत के लिए अपनी भाषा में अल्लाह से दुआ करना मना नहीं है। अरबी दुआएं पढ़ना अच्छी बात है, लेकिन हर शख़्स के लिए अरबी में दुआ करना ही ज़रूरी नहीं।
3. क्या अज़ान और इक़ामत के बीच कोई एक खास दुआ है?
कोई एक ऐसी खास दुआ सहीह हदीस से तय नहीं है जिसे हर व्यक्ति को इसी वक़्त ज़रूर पढ़ना हो। इस वक़्त अलग-अलग जायज़ दुआएं की जा सकती हैं।
4. क्या दुनिया की ज़रूरतों के लिए भी दुआ कर सकते हैं?
जी हाँ। रोज़गार, हलाल रिज़्क़, सेहत, घरवालों की भलाई, औलाद, परेशानियों से निजात और दूसरी जायज़ ज़रूरतों के लिए दुआ की जा सकती है।
5. क्या इक़ामत शुरू होने तक लगातार दुआ करते रहना चाहिए?
ज़रूरी नहीं कि इंसान पूरे वक़्त लगातार दुआ करता रहे। जितना वक़्त मिले उसमें दुआ करना अच्छी बात है। इक़ामत शुरू होने पर नमाज़ की तैयारी और जमाअत में शामिल होना अहम है।
ख़ुलासा
अज़ान और इक़ामत के बीच का वक़्त मुसलमान के लिए दुआ का एक बहुत अहम मौक़ा है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने इस वक़्त की दुआ के बारे में फ़रमाया कि वह रद्द नहीं की जाती।
इसलिए जब भी अज़ान सुनें तो सिर्फ़ इक़ामत का इंतज़ार न करें, बल्कि इस वक़्त को अल्लाह की याद और दुआ में इस्तेमाल करें।
आप क़ुरआन की दुआएं पढ़ सकते हैं, सहीह हदीस से साबित दुआएं पढ़ सकते हैं और अपनी जायज़ ज़रूरतों के लिए अपने रब से अपनी ज़ुबान में भी मांग सकते हैं।
अल्लाह हमें सही तरीके से दुआ करने, अपनी इबादत में पाबंदी रखने और हमारी जायज़ दुआओं को क़बूल फ़रमाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
हदीस References
- Jami` at-Tirmidhi 212 — अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ के बारे में।
- Sunan Abi Dawud 521 — अज़ान और इक़ामत के बीच दुआ रद्द न होने की रिवायत।
- Qur’an, Surah Ghafir 40:60 — अल्लाह से दुआ करने और उसके जवाब की उम्मीद रखने के बारे में।
होम पेज – https://islamicknowledgehindi.com/
हमारे यूट्यूब पेज को चेक करें ( DoFollow ) – https://www.youtube.com/@DaastanByJafar
__PRESENT
__PRESENT__PRESENT
__PRESENT
__PRESENT
__PRESENT
