नबी यूनुस की दुआ(अलैहिस्सलाम) – Dua e Yunus Hindi
नबी यूनुस की दुआ(अलैहिस्सलाम) इस्लाम की सबसे मशहूर और असरदार दुआओं में से एक है। यह दुआ हमें सिखाती है कि जब इंसान मुसीबत, परेशानी या मुश्किल हालात में हो, तो उसे अल्लाह सुब्हानवा तआला की तरफ़ रुजू करना चाहिए और अपनी कोताही पर तौबा करनी चाहिए।
नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) ने यह दुआ बेहद मुश्किल हालत में पढ़ी थी। कुरआन में इस दुआ का ज़िक्र मौजूद है और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने भी इसकी बड़ी फ़ज़ीलत बयान फरमाई है।
नबी यूनुस की दुआ (अलैहिस्सलाम)
अरबी दुआ-
لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
हिंदी में दुआ-
ला इलाहा इल्ला अंता, सुब्हानका, इन्नी कुंतु मिनज़्-ज़ालिमीन।
Hinglish में-
La ilaha illa anta, Subhanaka, inni kuntu minaz-zalimeen.
दुआ का हिंदी मतलब-
ऐ अल्लाह! तेरे सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं है। तू हर ऐब और कमी से पाक है। बेशक मुझसे कोताही हुई और मैं कुसूरवारों में से था।
Meaning in English-
There is no deity worthy of worship except You. Glory be to You. Indeed, I have been among the wrongdoers.
कुरआन में नबी यूनुस की दुआ
नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) की यह दुआ सूरह अल-अंबिया, आयत 87 में आती है।
अल्लाह तआला नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) के बारे में बयान फरमाते है कि उन्होंने अंधेरों में अल्लाह को पुकारा –
لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
यहां हमें एक बहुत अहम सबक मिलता है। नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) ने अपनी परेशानी में सबसे पहले अल्लाह की वहदानियत का इक़रार किया, फिर अल्लाह की पाकीज़गी बयान की और उसके बाद अपनी कोताही का इक़रार किया। कुरआन – सूरह अल-अंबिया 21:87
नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) का वाक़िया
नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के नबी थे। उन्हें अपनी क़ौम की तरफ़ हिदायत और अल्लाह का पैग़ाम पहुंचाने के लिए भेजा गया था।
जब उनकी क़ौम ने उनकी बात को आसानी से कबूल नहीं किया, तो नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) वहां से चले गए। बाद में अल्लाह की हिकमत से वह समुद्र में पहुंचे और एक बड़ी मछली ने उन्हें निगल लिया।
वहां अंधेरों के अंदर नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब को पुकारा। उन्होंने शिकायत करने के बजाय अल्लाह की वहदानियत व पाकीज़गी बयान की और अपनी कोताही का इक़रार किया।
अल्लाह सुब्हानवा तआला ने उनकी दुआ कबूल फरमाई और उन्हें उस मुश्किल से निजात दी।
कुरआन में आगे अल्लाह सुब्हानवा तआला फरमाते है कि आपने नबी की दुआ को कबूल किया और उन्हें ग़म से निजात दी। सूरह अल-अंबिया 21:88 में यह बात बयान हुई है।
इस दुआ की फ़ज़ीलत
नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) की दुआ की बड़ी फ़ज़ीलत हदीस में बयान हुई है।
हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास ( रदिअल्लाहुताला अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम), जिन्हें ज़ुन-नून भी कहा जाता है, की इस दुआ का ज़िक्र फरमाया।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने बताया कि कोई मुसलमान इस दुआ के ज़रिए किसी मामले में अल्लाह से दुआ करे, तो अल्लाह उसकी दुआ का जवाब देते है।
हदीस – जामे तिर्मिज़ी, हदीस 3505 इसे Darussalam grading में Sahih बताया गया है।
इसका मतलब यह नहीं कि इंसान सिर्फ़ अल्फ़ाज़ पढ़े और अपनी कोशिश छोड़ दे। एक मुसलमान को अल्लाह से दुआ के साथ-साथ जायज़ कोशिश और सही असबाब भी अपनाने चाहिए।
यह दुआ इतनी असरदार क्यों है?
इस छोटी सी दुआ में तीन बहुत बड़ी बातें मौजूद हैं:
1. अल्लाह की वहदानियत
ला इलाहा इल्ला अंता का मतलब है कि अल्लाह के अलावा कोई सच्चा माबूद नहीं।
यह इंसान के दिल को याद दिलाता है कि असली मदद और ताक़त सिर्फ़ अल्लाह के पास है।
2. अल्लाह की पाकीज़गी
सुब्हानका का मतलब है कि ऐ अल्लाह, तू हर ऐब, कमी और नाइंसाफ़ी से पाक है।
इंसान अपनी मुश्किल में भी अल्लाह पर कोई इल्ज़ाम नहीं लगाता।
3. अपनी कोताही का इक़रार
इन्नी कुंतु मिनज़्-ज़ालिमीन में इंसान अपनी गलती और कोताही को मानता है।
यह हमें तकब्बुर छोड़कर अल्लाह के सामने आजिज़ी और तौबा के साथ झुकना सिखाता है।
नबी यूनुस की दुआ कब पढ़ें?
आप यह दुआ खास तौर पर इन मौक़ों पर पढ़ सकते हैं:
- जब दिल परेशान हो
- किसी मुश्किल या मुसीबत में हों
- ग़म और बेचैनी महसूस हो
- अपनी गलती पर तौबा करना चाहते हों
- अल्लाह से मदद मांगना चाहते हों
इस दुआ को पढ़ने के लिए कोई ऐसी तय संख्या कुरआन या सहीह हदीस से साबित नहीं है कि इसे ज़रूर किसी खास गिनती में पढ़ा जाए।
इसलिए बेहतर है कि इसे समझकर, ख़ुलूस और यक़ीन के साथ पढ़ें और अपनी ज़रूरत के लिए अल्लाह से दुआ करें।
दुआ पढ़ने का सही तरीका
आप पहले यह दुआ पढ़ सकते हैं-
ला इलाहा इल्ला अंता, सुब्हानका, इन्नी कुंतु मिनज़्-ज़ालिमीन।
इसके बाद अपनी ज़रूरत के लिए अपने अल्फ़ाज़ में अल्लाह से दुआ करें।
मिसाल के तौर पर आप अल्लाह से हिदायत, राहत, रिज़्क़, परेशानी से निजात और अपनी मुश्किल आसान करने की दुआ कर सकते हैं।
इस दुआ से मिलने वाला सबक
नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) की दुआ हमें बताती है कि मुश्किल कितनी भी बड़ी क्यों न हो, एक मोमिन को अल्लाह से मायूस नहीं होना चाहिए।
जब चारों तरफ़ अंधेरा महसूस हो और इंसान को कोई रास्ता न दिखाई दे, तब भी अल्लाह की रहमत मौजूद होती है।
यह दुआ हमें सिखाती है-
- अल्लाह पर भरोसा रखें
- अपनी गलती मानने से न डरें
- तौबा करें
- मुसीबत में अल्लाह को याद करें
- अल्लाह की रहमत से उम्मीद रखें
नबी यूनुस की दुआ के बारे में 5 FAQs
1. नबी यूनुस की दुआ कौन सी है?
नबी यूनुस (अलैहिस्सलाम) की मशहूर दुआ है-
ला इलाहा इल्ला अंता, सुब्हानका, इन्नी कुंतु मिनज़्-ज़ालिमीन।
यह सूरह अल-अंबिया, आयत 87 में मौजूद है।
2. नबी यूनुस की दुआ किस सूरह में है?
यह दुआ सूरह अल-अंबिया, आयत 87 में है।
3. नबी यूनुस की दुआ कब पढ़नी चाहिए?
इसे मुसीबत, परेशानी, ग़म, तौबा और अल्लाह से मदद मांगने के मौक़े पर पढ़ा जा सकता है।
4. क्या इस दुआ को किसी खास संख्या में पढ़ना जरूरी है?
क़ुरान और सहीह हदीस से इस दुआ के लिए कोई तय संख्या साबित नहीं है। इसलिए इसे ख़ुलूस और समझ के साथ पढ़ना बेहतर है।
5. नबी यूनुस की दुआ की फ़ज़ीलत क्या है?
जामे तिर्मिज़ी की हदीस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने इस दुआ की बड़ी फ़ज़ीलत बयान फरमाई है और बताया कि मुसलमान जब इसके साथ अल्लाह से दुआ करता है, तो अल्लाह उसकी दुआ का जवाब देते है।
आखिर में
नबी यूनुस की दुआ (अलैहिस्सलाम) सिर्फ़ मुश्किल वक्त में पढ़ने के लिए कुछ अल्फ़ाज़ नहीं है, बल्कि यह अल्लाह के सामने आजिज़ी, तौबा, उम्मीद और भरोसे का खूबसूरत इज़हार है।
जब भी ज़िंदगी में परेशानी आए, अल्लाह की रहमत से मायूस न हों। अपने रब की तरफ़ रुजू करें और दिल से कहें –
لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
ला इलाहा इल्ला अंता, सुब्हानका, इन्नी कुंतु मिनज़्-ज़ालिमीन।
अल्लाह सुब्हानवा तआला हम सभी को मुश्किल वक्त में सही तरीके से अपनी तरफ़ रुजू करने और दुआ करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।
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