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Prasad Khana Islam Mein Halal Ya Haram? जानें 7 ज़रूरी बातें

इस्लाम में प्रसाद खाना हलाल है या हराम? 

भारत में हिंदू और मुस्लिम अक्सर एक ही मोहल्ले, दफ़्तर, स्कूल और कारोबार में साथ रहते हैं। ऐसे में कई बार किसी हिंदू दोस्त, पड़ोसी या साथी की तरफ़ से मिठाई, फल या लड्डू प्रसाद के तौर पर मिलते हैं। उस वक़्त मुसलमान के दिल में सवाल आता है कि क्या इस्लाम में प्रसाद खाना हलाल है या हराम?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि खाना किस तरह का है, क्या उसे किसी देवी-देवता के सामने धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किया गया है और इस बारे में उलेमा की क्या राय है।

इस्लाम में अल्लाह तआला के अलावा किसी दूसरे की इबादत करना जायज़ नहीं है। साथ ही, दूसरे मज़हब के लोगों के साथ अच्छे अख़लाक़ से पेश आना भी ज़रूरी है।

मुख़्तसर जवाब- जिन उलेमा के नज़दीक किसी दूसरे माबूद के नाम पर चढ़ाया गया खाना नाजायज़ है, उनके मुताबिक़ ऐसा प्रसाद नहीं खाना चाहिए। कुछ दूसरे उलेमा ने खाने की सामग्री और खाने वाले की नीयत को देखते हुए गुंजाइश बताई है। इसलिए हर तरह के प्रसाद के बारे में बिना तफ़सील जाने एक ही हुक्म लगाना सही नहीं है।

प्रसाद क्या होता है?

प्रसाद आम तौर पर उस खाने, मिठाई या फल को कहा जाता है जिसे हिंदू धार्मिक रस्म के दौरान किसी देवी-देवता के सामने पेश किया जाता है और फिर लोगों में बांटा जाता है।

इसमें आम तौर पर ये चीज़ें हो सकती हैं:

यहाँ एक अहम फ़र्क़ समझें- किसी हिंदू दोस्त का आम मिठाई देना और किसी देवी-देवता को धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश की गई मिठाई देना, दोनों एक जैसी सूरतें नहीं हैं।

क़ुरआन में प्रसाद के बारे में क्या हुक्म है? Prasad Khana Islam Mein Halal Ya Haram?

क़ुरआन में आज के इस्तेमाल वाले लफ़्ज़ “प्रसाद” का नाम लेकर कोई अलग आयत नहीं आई है। इस मसले पर उलेमा दूसरी आयतों से उसूल समझते हैं।

1. सूरह अल-माइदा, आयत 3

अल्लाह सुब्हानवा तआला फरमाते है कि तुम्हारे लिए वह चीज़ हराम की गई है जो अल्लाह के सिवा किसी दूसरे के नाम पर मंसूब की गई हो। इस आयत में दूसरी मनाही के साथ अल्लाह के अलावा किसी के लिए ज़बह किए गए जानवर का ज़िक्र भी है।

हवाला- क़ुरआन, सूरह अल-माइदा (5:3)

इस आयत की तफ़सीर और फ़िक़्ही इस्तेमाल की बुनियाद पर कुछ उलेमा दूसरे माबूद के लिए धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किए गए खाने से भी बचने का हुक्म देते हैं।

हालाँकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि आयत में ज़बह और दूसरी मना की गई चीज़ों का भी ज़िक्र है। शाकाहारी मिठाई या फल पर इस हुक्म का लागू होना कैसे समझा जाए, इस बारे में उलेमा की राय अलग हो सकती है।

2. सूरह अल-अनआम, आयत 121

क़ुरआन में अल्लाह के नाम के बजाय किसी दूसरे के नाम पर ज़बह किए गए खाने से संबंधित मनाही का ज़िक्र मिलता है।

हवाला- क़ुरआन, सूरह अल-अनआम (6:121)

इस आयत का सीधा ताल्लुक ज़बह और खाने पर अल्लाह का नाम न लिए जाने के मसले से है। इसलिए इसे हर तरह की मिठाई या फल पर बिना तफ़सील के लागू बताना ठीक नहीं होगा।

प्रसाद खाने के बारे में उलेमा की राय

इस मसले को समझने के लिए दोनों मशहूर राय जानना ज़रूरी है।

1. प्रसाद से बचने की राय

कई हनफ़ी उलेमा के फ़तवों में कहा गया है कि जो खाना किसी देवी-देवता या बुत के सामने धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किया गया हो, उसे नहीं खाना चाहिए। इस राय के मुताबिक़ मिठाई, फल या दूसरी शाकाहारी चीज़ भी इससे अलग नहीं होती, अगर वह उसी धार्मिक चढ़ावे का हिस्सा हो।

हवाला- MuftiOnline, “Consuming Food Given as Offerings to Idols”; IslamQA.org पर प्रकाशित हनफ़ी फ़तवा।

इस राय के मुताबिक़ अगर कोई आपको साफ़ तौर पर बताए कि यह मंदिर का प्रसाद है, तो अदब से मना करना बेहतर है।

2. कुछ उलेमा की गुंजाइश वाली राय

मिस्र की Dar Al-Ifta ने प्रसाद के बारे में एक अलग राय पेश की है। उसके मुताबिक़ दूसरे मज़हब के लोगों से खाना लेना अपने आप में मना नहीं है। अगर खाने में कोई हराम चीज़ न हो और मुसलमान उसे दूसरे की धार्मिक मान्यता में हिस्सा लेने के बजाय सामाजिक मेल-जोल के तौर पर खाए, तो कुछ शर्तों के साथ इसकी गुंजाइश है।

हवाला- Dar Al-Ifta, “Muslims Eating Prasad”, 24 अगस्त 2015।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सभी इस्लामी उलेमा इस मसले पर एक ही राय रखते हैं।

लड्डू, फल और मिठाई का प्रसाद खाना कैसा है?

प्रसाद की किस्म के साथ यह भी देखना ज़रूरी है कि उसे किस तरह पेश किया गया था।

क्या प्रसाद लेने से मुसलमान का ईमान चला जाता है?

सिर्फ़ प्रसाद लेने या खाने की वजह से किसी मुसलमान को इस्लाम से बाहर क़रार देना सही नहीं है। किसी अमल का शरई हुक्म और किसी शख़्स के ईमान का फ़ैसला दो अलग बातें हैं।

इस्लाम में तौहीद यानी सिर्फ़ अल्लाह की इबादत बुनियादी अक़ीदा है। किसी दूसरे माबूद की इबादत करना या उसके धार्मिक अक़ीदे को अपनाना इस्लामी तालीमात के ख़िलाफ़ है। लेकिन किसी शख़्स के इरादे, जानकारी और हालात को समझे बिना उस पर बड़ा धार्मिक हुक्म लगाना ठीक नहीं।

अगर किसी ने अनजाने में प्रसाद खा लिया, तो उसे घबराने या अपने ईमान के बारे में बेवजह डरने के बजाय मसले को समझना चाहिए और आगे के लिए अपने भरोसेमंद मुफ़्ती से रहनुमाई लेनी चाहिए।

हिंदू दोस्त प्रसाद दे तो क्या करें?

अगर आपका हिंदू दोस्त, पड़ोसी या सहकर्मी आपको प्रसाद देता है, तो आप उससे अदब से बात कर सकते हैं। किसी के मज़हब का मज़ाक़ उड़ाना या उसे नीचा दिखाना ज़रूरी नहीं है।

आप कह सकते हैं-

“आपकी मोहब्बत का शुक्रिया। मैं अपने मज़हबी उसूलों की वजह से प्रसाद नहीं खाता, लेकिन आपकी इज़्ज़त करता हूँ।”

इस तरह आप अपनी धार्मिक हदों का ख़याल रखते हुए दूसरे शख़्स के साथ अच्छे अख़लाक़ से पेश आ सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQs

1. क्या मुसलमान मंदिर का प्रसाद खा सकता है?

इस बारे में उलेमा की अलग-अलग राय है। कई उलेमा धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किए गए प्रसाद को खाने से मना करते हैं, जबकि Dar Al-Ifta ने कुछ शर्तों के साथ इसकी गुंजाइश बताई है।

2. क्या हिंदू के हाथ से दिया हुआ लड्डू खाना हराम है?

सिर्फ़ किसी हिंदू के हाथ से मिलने की वजह से लड्डू हराम नहीं होता। यह देखना ज़रूरी है कि वह आम मिठाई है या किसी देवी-देवता को धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किया गया प्रसाद।

3. क्या प्रसाद के रूप में मिले फल खाना जायज़ है?

इस मसले पर भी उलेमा के बीच इख़्तिलाफ़ है। कुछ उलेमा चढ़ाए गए फल से भी बचने को कहते हैं, जबकि कुछ दूसरे उलेमा अलग शर्तों के साथ गुंजाइश बताते हैं।

4. अगर गलती से प्रसाद खा लिया तो क्या करें?

अगर आपने अनजाने में प्रसाद खा लिया, तो घबराएँ नहीं। आगे के लिए अपने भरोसेमंद मुफ़्ती से पूछें और उनकी रहनुमाई के मुताबिक़ अमल करें। केवल इस वजह से किसी मुसलमान को इस्लाम से बाहर नहीं कहा जा सकता।

5. क्या मुसलमान अपने हिंदू दोस्तों की मिठाई स्वीकार कर सकता है?

आम मिठाई या खाना स्वीकार करने का हुक्म, धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किए गए प्रसाद से अलग हो सकता है। अगर खाना किसी धार्मिक रस्म का हिस्सा नहीं है और उसमें हराम सामग्री नहीं है, तो आम तौर पर उसे स्वीकार करने में गुंजाइश है।

आख़िरी बात

प्रसाद खाने के मसले में सबसे अहम बात यह है कि आम खाने और किसी दूसरे माबूद के लिए धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किए गए खाने के बीच फ़र्क़ समझा जाए। क़ुरआन की सूरह अल-माइदा (5:3) इस मसले में एक अहम दलील है, लेकिन शाकाहारी प्रसाद पर उसके लागू होने के बारे में उलेमा की राय अलग है।

अगर आप एहतियात वाली राय पर अमल करना चाहते हैं, तो धार्मिक चढ़ावे के तौर पर पेश किए गए प्रसाद से बच सकते हैं। अपने हालात के मुताबिक़ पक्का शरई हुक्म जानने के लिए किसी भरोसेमंद मुफ़्ती से पूछें।

अल्लाह सुब्हानवातआला हमें सही बात समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

हवाले और मज़ीद पढ़ें

  1. क़ुरआन, सूरह अल-माइदा (5:3): https://quran.com/5/3
  2. क़ुरआन, सूरह अल-अनआम (6:121): https://quran.com/6/121

नोट: यह लेख आम मालूमात के लिए है। किसी खास सूरत का फ़ैसला करने के लिए अपने भरोसेमंद मुफ़्ती से मशवरा करें।

जज़ाकल्लाह खैर। अल्लाह सुब्हानवताला इस कोशिश में हुई छोटी बड़ी गलती को माफ़ करे  – आमीन ।

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