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नमाज़ में सना की दुआ – 5 ज़रूरी बातें, सही तरीका और हिंदी में मतलब

नमाज़ में सना की दुआ

सना की दुआ क्या है?

नमाज़ में तकबीर-ए-तहरीमा यानी “अल्लाहु अकबर” कहकर नमाज़ शुरू करने के बाद जो दुआ पढ़ी जाती है, उसे आम तौर पर सना कहा जाता है। यह दुआ अल्लाह सुब्हानवताला की पाकीज़गी, हम्द और उसकी अज़मत को बयान करती है।

सना की दुआ की शुरुआत “सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका” से होती है। इसमें अल्लाह की तारीफ़, उसके नाम की बरकत और उसकी बुज़ुर्गी का ज़िक्र किया जाता है।

सना को नमाज़ की शुरुआती दुआ यानी दुआ-ए-इस्तिफ़्ताह भी कहा जाता है। इसके अलग-अलग अल्फ़ाज़ से शुरू होने वाली दुआएं भी हदीस में मिलती हैं।

सना की दुआ अरबी में

سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَىٰ جَدُّكَ، وَلَا إِلَٰهَ غَيْرُكَ

सना की दुआ हिंदी में

सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका, व तबा-रकस्मुका, व तआला जद्दुका, व ला इलाहा ग़ैरुक।

Sana Dua in Hinglish

Subhanaka Allahumma wa bihamdika, wa tabarakasmuka, wa ta’ala jadduka, wa la ilaha ghairuk.

सना की दुआ का हिंदी में मतलब

ऐ अल्लाह! तू पाक है और तेरी ही हम्द के साथ तेरी पाकीज़गी बयान करता हूँ। तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी शान बुलंद है और तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।

Sana Dua Meaning in English

“Glory be to You, O Allah, and praise is Yours. Blessed is Your Name, exalted is Your Majesty, and there is no deity worthy of worship besides You.”

सना की दुआ का सही तरीका

नमाज़ में सना पढ़ने का आम तरीका इस तरह है –

  1. सबसे पहले वुज़ू करके क़िब्ला रुख़ खड़े हों।
  2. नमाज़ शुरू करने के लिए “अल्लाहु अकबर” कहें। इसे तकबीर-ए-तहरीमा कहते हैं।
  3. इसके बाद सना की दुआ पढ़ें।
  4. फिर तअव्वुज़ यानी “अऊज़ु बिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम” और बिस्मिल्लाह पढ़कर सूरह अल-फ़ातिहा शुरू करें।

सना पढ़ने के बाद नमाज़ के अगले हिस्से में बढ़ें। अलग-अलग फ़िक़्ही मस्लकों में कुछ अमली तफ़सील का फ़र्क़ हो सकता है।

सना की दुआ कब पढ़ी जाती है?

सना आम तौर पर नमाज़ की पहली रकअत में तकबीर-ए-तहरीमा के बाद पढ़ी जाती है।

सना सूरह अल-फ़ातिहा का हिस्सा नहीं है, बल्कि नमाज़ की शुरुआत में पढ़ी जाने वाली दुआ है।

सना की दुआ का हदीस से हवाला

सना की दुआ के अल्फ़ाज़ हदीस की किताबों में बयान हुए हैं।

हदीस 1 – जामे तिर्मिज़ी

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम जब नमाज़ शुरू करते, तो यह दुआ पढ़ते –

“सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका, व तबा-रकस्मुका, व तआला जद्दुका, व ला इलाहा ग़ैरुक।”

हवाला – जामे तिर्मिज़ी, हदीस 243। इस रिवायत को दारुस्सलाम की तहक़ीक़ में हसन दर्ज किया गया है। इमाम तिर्मिज़ी ने इसकी सनद के एक रावी के हिफ़्ज़ के बारे में भी कलाम नक़्ल किया है।

हदीस 2 – जामे तिर्मिज़ी

हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रात की नमाज़ के सिलसिले में रिवायत है कि नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम तकबीर के बाद सना के ये अल्फ़ाज़ पढ़ते थे।

हवाला – जामे तिर्मिज़ी, हदीस 242। इस रिवायत को दारुस्सलाम की तहक़ीक़ में हसन दर्ज किया गया है।

क़ुरआन में सना की दुआ का ज़िक्र

सना के यही पूरे अल्फ़ाज़ क़ुरआन की किसी एक आयत में नहीं आते। यह नमाज़ की शुरुआती दुआ है, जिसके अल्फ़ाज़ हदीस से मालूम होते हैं।

हालाँकि क़ुरआन में अल्लाह की तस्बीह और हम्द का हुक्म कई जगह दिया गया है।

सूरह अल-इसरा, आयत 111

इस आयत में अल्लाह की हम्द और उसकी बड़ाई बयान करने का ज़िक्र है।

सूरह अल-हश्र, आयत 23

इस आयत में अल्लाह के नामों और उसकी अज़मत का बयान मिलता है।

इन आयतों में सना के पूरे अल्फ़ाज़ नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की हम्द और अज़मत से जुड़ी तालीमात मिलती हैं।

सना की दुआ की फ़ज़ीलत

सना की दुआ नमाज़ की शुरुआत में अल्लाह सुब्हानवताला की हम्द और पाकीज़गी बयान करने का एक तरीक़ा है।

1. अल्लाह की हम्द और तस्बीह

सना में अल्लाह की पाकीज़गी और तारीफ़ बयान की जाती है। इससे बंदा अपनी इबादत की शुरुआत अल्लाह की अज़मत के ज़िक्र से करता है।

2. अल्लाह की बुज़ुर्गी का इज़हार

“व तआला जद्दुका” के अल्फ़ाज़ अल्लाह की शान और अज़मत को बयान करते हैं।

3. तौहीद का इज़हार

“व ला इलाहा ग़ैरुक” का मतलब है कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। यह अल्लाह की वहदानियत का इज़हार है।

4. नमाज़ की शुरुआत में दुआ

सना नमाज़ की शुरुआत में पढ़ी जाने वाली दुआ है, जो बंदे को अल्लाह की हम्द और ज़िक्र की तरफ़ मुतवज्जे करती है।

5. नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की तालीमात पर अमल

हदीस में नमाज़ की शुरुआत में इस तरह की दुआ पढ़ने का ज़िक्र मिलता है। इसे पढ़ना नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम की तालीमात पर अमल करने का एक तरीक़ा है।

क्या सना पढ़ना ज़रूरी है?

सना नमाज़ की शुरुआती दुआ है। इसे पढ़ने का हुक्म फ़िक़्ही मस्लक के मुताबिक़ अलग-अलग हो सकता है।

आम तौर पर इसे सुन्नत या मुस्तहब अमल माना जाता है, फ़र्ज़ या रुक्न नहीं। इसलिए अगर कोई सना पढ़ना भूल जाए, तो आम तौर पर उसकी नमाज़ हो जाती है।

हालाँकि किसी ख़ास मस्लक के मुताबिक़ अमल करने वाले शख़्स को अपने आलिम से मसला पूछना चाहिए।

सना की दुआ याद करने का आसान तरीका

सना को याद करने के लिए इसे छोटे हिस्सों में बाँट लें –

हर हिस्से को अलग-अलग पढ़ें और फिर पूरी दुआ को मिलाकर दोहराएं। अरबी अल्फ़ाज़ की सही अदायगी के लिए किसी क़ारी या जानकार से सुनकर सीखना बेहतर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. सना की दुआ नमाज़ में कब पढ़ी जाती है?

सना नमाज़ शुरू करने के लिए “अल्लाहु अकबर” कहने के बाद पहली रकअत में पढ़ी जाती है। इसके बाद सूरह अल-फ़ातिहा पढ़ी जाती है।

2. सना की दुआ पढ़ना फ़र्ज़ है या सुन्नत?

सना को आम तौर पर सुन्नत या मुस्तहब दुआ माना जाता है। यह नमाज़ का फ़र्ज़ या रुक्न नहीं है। इसके हुक्म की तफ़सील में फ़िक़्ही मस्लकों के बीच कुछ फ़र्क़ हो सकता है।

3. अगर सना पढ़ना भूल जाएं तो क्या नमाज़ हो जाएगी?

आम तौर पर सना भूल जाने से नमाज़ फ़ासिद नहीं होती और सज्दा-ए-सह्व भी ज़रूरी नहीं होता। अपने मस्लक के मुताबिक़ तफ़सील के लिए आलिम से पूछ सकते हैं।

4. क्या सना हर रकअत में पढ़ी जाती है?

आम तौर पर सना नमाज़ की पहली रकअत में ही पढ़ी जाती है। हर रकअत में इसे दोहराना ज़रूरी नहीं है।

5. क्या इमाम के पीछे सना पढ़ सकते हैं?

इस मसले में फ़िक़्ही मस्लकों के बीच इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। अपने मस्लक और इमाम के अमल के मुताबिक़ किसी भरोसेमंद आलिम से रहनुमाई लेना बेहतर है।

ख़ुलासा

सना की दुआ नमाज़ की शुरुआत में पढ़ी जाने वाली एक अहम दुआ है, जिसमें अल्लाह सुब्हानवताला की पाकीज़गी, हम्द, बरकत और अज़मत का बयान किया जाता है।

इसे सही अरबी अल्फ़ाज़ के साथ याद करना और इसके मतलब को समझना नमाज़ में तवज्जोह और ख़ुशू पैदा करने में मददगार हो सकता है।

अल्लाह सुब्हानवताला हमें सही तरीक़े से नमाज़ पढ़ने और अपनी इबादत में ख़ुलूस पैदा करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

हदीस के ऑनलाइन हवाले

  1. जामे तिर्मिज़ी 243: https://sunnah.com/tirmidhi:243
  2. जामे तिर्मिज़ी 242: https://sunnah.com/tirmidhi:242

जज़ाकल्लाह खैर। अल्लाह सुब्हानवताला इस कोशिश में हुई छोटी बड़ी गलती को माफ़ करे  – आमीन ।

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