पहली जुमे की नमाज़ का इतिहास | इस्लाम में पहला जुमा कहाँ पढ़ा गया था? (First Jummah Prayer in islam Hindi )

पहली जुमा की नमाज़ (First Jummah Prayer in islam Hindi)

First Jummah Prayer in islam Hindi

1,400 साल पुरानी जुमे की नमाज़ की तारीख – पहली जुमा की नमाज़ कहाँ और क्यों पढ़ी गई? 

जुमे की नमाज़ यानी सलातुल-जुमुआ इस्लाम में हफ्ते के सबसे अहम इबादती मौकों में से एक है। हर जुमे के दिन मुसलमान मस्जिद में जमा होकर अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, ख़ुत्बा सुनते हैं और जमाअत के साथ जुमे की नमाज़ अदा करते हैं।

सबसे पहली जुमे की नमाज़ कब और कहाँ पढ़ी गई थी? इसे सबसे पहले किसने पढ़ाया था? और नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम  की मक्का से मदीना हिजरत से पहले जुमे की नमाज़ कैसे शुरू हुई?

इसका जवाब इस्लामी तारीख़ और हदीस की किताबों में मिलता है।

पहली जुमे की नमाज़ कब शुरू हुई?

मशहूर और हसन दर्जे की हदीस के मुताबिक़, मदीना में नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम की हिजरत से पहले ही जुमे की नमाज़ क़ायम की जा चुकी थी।

हज़रत कअब बिन मालिक रदिअल्लाहु ताला अन्हो से रिवायत है कि जब वह जुमे की अज़ान सुनते तो हज़रत असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो के लिए रहमत की दुआ करते।

जब उनसे इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने बताया कि असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो ने सबसे पहले उन्हें जुमे की नमाज़ पढ़ाई थी। यह नमाज़ नक़ीअ अल-ख़दमतात के इलाके में, हज़रत बनू बयादा से जुड़े हज़्म अन-नबीत नामी जगह पर पढ़ी गई थी। उस समय वहाँ 40 लोग मौजूद थे। यह रिवायत सुनन अबू दाऊद 1069 में आई है।

यानी, यह कहना ज्यादा सही है कि मदीना में पहली जुमे की नमाज़ नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम की हिजरत से पहले असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो की क़यादत में अदा की गई थी।

पहली जुमे की नमाज़ कहाँ पढ़ी गई थी? (First Jummah Prayer in islam Hindi)

हदीस में जिस जगह का ज़िक्र आता है उसे नक़ीअ अल-ख़दमतात (Naqi’ al-Khadamat) और उसके अंदर हज़्म अन-नबीत (Hazm an-Nabit) के नाम से बयान किया गया है।

यह इलाका मदीना के आसपास था और बनू बयादा से जुड़े हर्रा के इलाके में मौजूद बताया गया है। एक हदीस में इसे मदीना से लगभग एक मील दूर बताया गया है।

इसलिए पहली जुमे की नमाज़ के इतिहास को केवल मस्जिद की इमारत से जोड़ना सही नहीं होगा। उस समय मुसलमान एक खुले स्थान में भी जमाअत के लिए इकट्ठा होते थे।

असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो कौन थे? 

हज़रत असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो मदीना के शुरुआती अंसार सहाबा में से थे और इस्लाम के मदीना में फैलने के शुरुआती दौर में उनका महत्वपूर्ण किरदार था।

मदीना में इस्लाम का पैग़ाम पहुँचने के बाद वहाँ मुसलमानों की एक जमाअत बनने लगी। इसी दौर में जुमे की नमाज़ भी क़ायम की गई।

हज़रत कअब बिन मालिक रदिअल्लाहु ताला अन्हो का उनके लिए हर जुमा अज़ान सुनकर दुआ करना इस बात की अहमियत को दिखाता है कि असअद रदिअल्लाहु ताला अन्हो ने मदीना के शुरुआती मुसलमानों को एक जगह जमा करने में बेहद अहम जिम्मेदारी निभाई थी।

उस समय जुमे की नमाज़ की ज़रूरत क्यों पड़ी? 

जुमे की नमाज़ का सबसे बड़ा मक़सद सिर्फ़ दो रकअत नमाज़ पढ़ना नहीं है।

जुमुआ का मतलब ही जमा होना और इकट्ठा होना है।

जुमे को मुसलमान एक जगह जमा होते हैं ताकि –

  • अल्लाह का ज़िक्र किया जाए।
  • दीन की बातें याद दिलाई जाएँ।
  • ख़ुत्बे के ज़रिए नसीहत हासिल की जाए।
  • मुसलमानों के बीच भाईचारा मज़बूत हो।
  • दुनिया के कामों से कुछ समय निकालकर आख़िरत की तरफ़ ध्यान किया जाए।
  • पूरी मुस्लिम जमाअत को एक साथ इबादत का मौका मिले।

मदीना में इस्लाम तेजी से फैल रहा था और नए मुसलमानों को एक साथ इबादत और दीन की तालीम की ज़रूरत थी। जुमे की जमाअत ने इस ताआम ज़िंदगी को मजबूत करने में जरुरी किरदार अदा किया है ।

क्या नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने पहली जुमे की नमाज़ पढ़ाई थी? 

यहाँ एक बेहद जरुरी बात समझना ज़रूरी है।

मदीना में सबसे पहली जुमे की नमाज़ नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम के मदीना पहुँचने से पहले पढ़ी गई थी।

सुनन अबू दाऊद की रिवायत साफ़ तौर पर बताती है कि असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो ने उस समय लोगों को जुमे की नमाज़ पढ़ाई और लगभग 40 लोग मौजूद थे।

इसके बाद जब रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने मक्का से मदीना हिजरत की, तो मदीना में जुमे की नमाज़ का सिलसिला नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम की सुन्नत और अमल के साथ और ज्यादा मुकम्मल तौर पर सामने आया।

हिजरत के बाद नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने मदीना में मुसलमानो के मजहबी मामलों और मासरे की तौरतरीकों को मजबूत किया और जुमुआ उसमें एक बेहद अहम हिस्सा था।

क़ुरआन में जुमे की नमाज़ का ज़िक्र 

क़ुरआन में पूरी एक सूरह का नाम ही सूरह अल-जुमुआ है।

अल्लाह सुबहाना व तआला फरमाते है –

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نُودِيَ لِلصَّلَاةِ مِن يَوْمِ الْجُمُعَةِ فَاسْعَوْا إِلَىٰ ذِكْرِ اللَّهِ وَذَرُوا الْبَيْعَ

मायने –

“ऐ ईमान वालों! जब जुमे के दिन नमाज़ के लिए पुकार दी जाए तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ बढ़ो और खरीद-फ़रोख़्त छोड़ दो।”

— सूरह अल-जुमुआ, 62:9

इस आयत में जुमे की नमाज़ के वक़्त दुनिया के कारोबार को छोड़कर अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ जाने का हुक्म दिया गया है।

इसके बाद अगली आयत में अल्लाह सुबहाना व तआला फरमाते है कि नमाज़ पूरी हो जाने के बाद ज़मीन में फैल जाओ और अल्लाह का फ़ज़्ल तलाश करो। यानी इस्लाम इबादत और दुनिया के जायज़ कामों के बीच बैलेंस सिखाता है।

जुमे की नमाज़ का असली मक़सद क्या है? 

जुमुआ हमें यह याद दिलाता है कि इंसान की ज़िंदगी केवल कारोबार, नौकरी, पैसा और दुनिया की भाग-दौड़ का नाम नहीं है।

पूरा हफ्ता इंसान अपने दुनियावी कामों में मसगूल रहता है, लेकिन जुमे को उसे दोबारा अपनी रूहानी ज़िंदगी की तरफ़ लौटने का मौका मिलता है।

इसीलिए क़ुरआन में जुमे की नमाज़ के लिए बुलाए जाने पर “अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ बढ़ो और कारोबार छोड़ दो” कहा गया है।

जुमे की अज़ान के बारे में एक बेहद जरुरी तारीखी बात 

आज कई मस्जिदों में जुमे से पहले अज़ान दी जाती है और फिर ख़ुत्बे के बाद दूसरी अज़ान होती है। लेकिन तारीख में अज़ान का निज़ाम बाद में बदला।

हज़रत साएब बिन यज़ीद रदिअल्लाहु ताला अन्हो से रिवायत है कि नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम, हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रदिअल्लाहु ताला अन्हो और हज़रत उमर रदिअल्लाहु ताला अन्हो के दौर में जुमे की अज़ान उस समय दी जाती थी जब इमाम मिंबर पर बैठते थे।

बाद में हज़रत उस्मान रदिअल्लाहु ताला अन्हो के दौर में जब आबादी बढ़ गई तो उन्होंने एक और अज़ान का इंतज़ाम कराया ताकि लोगों को पहले से जुमे के लिए खबर हो सके। यह रिवायत सुनन अबू दाऊद 1087 में सहीह दर्जे के साथ मौजूद है।

इससे हमें पता चलता है कि जुमे का निजाम वक़्त के साथ,  मासरे की ज़रूरतों के हिसाब से भी बदला गया ।

पहली जुमे की नमाज़ से मिलने वाला सबक 

पहली जुमे की नमाज़ की कहानी हमें कई अहम बातें सिखाती है।

पहला सबक –  दीन की शुरुआत छोटी जमाअत से भी हो सकती है। पहली जुमे की नमाज़ में कुल 40 लोग थे, लेकिन उसी इबादत का तरीका आज पूरी दुनिया में करोड़ों मुसलमानों तक पहुँच चुका  है।

दूसरा सबक –  मस्जिद और जमाअत केवल नमाज़ की जगह नहीं, बल्कि मुसलमानो का मरकज़ इ इत्तेहाद हैं।

तीसरा सबक –  दुनिया के काम कितने भी ज़रूरी हों, अल्लाह की इबादत को सबसे ऊपर रखना ईमान का हिस्सा है।

चौथा सबक –  असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो जैसे शुरुआती मुसलमानों की मेहनत ने मदीना में इस्लाम के लिए मजबूत ज़मीन तैयार की।

पाँचवाँ सबक –  जुमुआ हमें हर हफ्ते अपनी ज़िंदगी, अपने अमल और अपने अल्लाह से रिश्ते का जायज़ा लेने का मौका देता है।

एक ज़रूरी तारीखी एहतियात 

पहली जुमे की नमाज़ के बारे में अलग-अलग किताबों में कुछ मालूमात मिलती हैं, इसलिए हर मक्बूल कहानी को बिना तहक़ीक़ के सही मान लेना सही नहीं है।

सबसे मजबूत बुनियादों में से एक सुनन अबू दाऊद 1069 की वह रिवायत है जिसमें कअब बिन मालिक रदिअल्लाहु ताला अन्हो से असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो की इमामत में  पहली जुमे की नमाज़ क़ायम करने और 40 लोगों की मौजूदगी का ज़िक्र मिलता है।

5 अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — FAQ 

1. सबसे पहली जुमे की नमाज़ किसने पढ़ाई थी?

हदीस के अनुसार हज़रत असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो ने मदीना में नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम की हिजरत से पहले पहली जुमे की नमाज़ पढ़ाई थी। उस समय लगभग 40 लोग मौजूद थे।

2. पहली जुमे की नमाज़ कहाँ पढ़ी गई थी?

यह नमाज़ नक़ीअ अल-ख़दमतात के इलाके में हज़्म अन-नबीत नामक मक़ाम पर पढ़ी गई थी, जो बनू बयादा के इलाके में बताया गया है।

3. क्या पहली जुमे की नमाज़ नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने पढ़ाई थी?

नहीं। हदीस के मुताबिक मदीना में पहली जुमे की नमाज़ नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम की हिजरत से पहले असअद बिन ज़ुरारा रदिअल्लाहु ताला अन्हो ने पढ़ाई थी। बाद में नबी रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने मदीना में जुमे की नमाज़ क़ायम की।

4. क़ुरआन में जुमे की नमाज़ का ज़िक्र कहाँ है?

सूरह अल-जुमुआ, आयत 9 में जुमे की नमाज़ के लिए बुलाए जाने पर अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ जाने और कारोबार छोड़ने का हुक्म दिया गया है।

5. जुमे की नमाज़ का मक़सद क्या है?

जुमे का मक़सद सिर्फ नमाज़ अदा करना नहीं, बल्कि मुसलमानों का एक साथ जमा होना, अल्लाह का ज़िक्र करना, ख़ुत्बे से नसीहत हासिल करना और अपनी रूहानी ज़िंदगी को बेहतर बनाना भी है।

जुमे की नमाज़ की तारीख सिर्फ एक नमाज़ की शुरुआत की मालूमात नहीं है, बल्कि यह मुस्लिम जमाअत के इत्तेहाद और अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ वापसी की मालूमात है।

मदीना में जब केवल एक छोटी सी जमाअत थी, तब भी मुसलमानों ने जुमे के दिन एक साथ इकट्ठा होकर अल्लाह की इबादत की। आज दुनिया के हर हिस्से में लाखों मस्जिदों में मुसलमान उसी जुमुआ के निज़ाम  को जारी रखते हैं।

जिस जुमे की शुरुआत लगभग 40 लोगों की छोटी जमाअत से हुई, वह आज पूरी दुनिया के मुसलमानों को हर सप्ताह एक साथ जोड़ता है।

अल्लाह हमें जुमे की नमाज़ की अहमियत समझने, उसे पाबंदी से अदा करने और उसके असल मक़सद—अल्लाह के ज़िक्र और अपनी इस्लाह—को अपनी ज़िंदगी में अपनाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

 

जज़ाकल्लाह खैर। अल्लाह सुब्हानवताला इस कोशिश में हुई छोटी बड़ी गलती को माफ़ करे  – आमीन ।

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जुमा से जुड़ी हुए और मालूमात यहां से पढ़ें   –  ख़ुत्बा अल हजाह – जुमे का अरबी खुत्बा