नबी इब्राहीम की दुआ (अ.) Nabi Ibrahim ki Dua

नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दुआ कुरआन की बेहद खूबसूरत और अहम दुआओं में से एक है। इस दुआ में हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह सुब्हानवा तआला से अपने लिए और अपनी औलाद के लिए नमाज़ कायम रखने की तौफ़ीक मांगते हैं।
यह दुआ हमें सिखाती है कि एक मोमिन को सिर्फ अपनी दुनिया की जरूरतों की फिक्र नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी ईमान, नमाज़ और औलाद की दीन की तरबियत के लिए भी अल्लाह से दुआ करनी चाहिए।
नबी इब्राहीम की दुआ(अलैहिस्सलाम)
अरबी में दुआ-
رَبِّ ٱجْعَلْنِى مُقِيمَ ٱلصَّلَوٰةِ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَآءِ
हिंदी में पढ़ने का तरीका-
रब्बिज्अल्नी मुकीमस्सलाति व मिन ज़ुर्रिय्यती रब्बना व तक़ब्बल दुआइ
Hinglish में पढ़ने का तरीका-
Rabbi-j’alni muqeemas-salaati wa min dhurriyyati Rabbanaa wa taqabbal du’aa
कुरआन रेफरेंस: सूरह इब्राहीम, आयत 40
दुआ का हिंदी मतलब-
ऐ मेरे रब! मुझे नमाज़ कायम करने वाला बना और मेरी औलाद में से भी। ऐ हमारे रब! मेरी दुआ कबूल फरमा।
Dua Meaning in English-
My Lord! Make me one who establishes prayer, and also make from my descendants those who establish prayer. Our Lord! Accept my supplication.
नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने यह दुआ क्यों मांगी?
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के बड़े जलीलुल-क़द्र नबियों में से थे। उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत बड़े इम्तिहान देखे, लेकिन हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखा।
उन्होंने सिर्फ अपने लिए हिदायत और नेकी की दुआ नहीं की, बल्कि अपनी औलाद के दीन और नमाज़ की भी फिक्र की।
इस दुआ में सबसे खूबसूरत बात यह है कि पहले उन्होंने अपने लिए कहा-
“मुझे नमाज़ कायम करने वाला बना”
और उसके बाद कहा-
“मेरी औलाद में से भी”
यानी एक नेक इंसान की फिक्र सिर्फ अपनी इबादत तक महदूद नहीं होती, बल्कि वह चाहता है कि उसकी आने वाली नस्लें भी अल्लाह से जुड़ी रहें।
सूरह इब्राहीम की इन्हीं आयतों के आसपास हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अपने बेटों इस्माईल अलैहिमस्सलाम और इस्हाक़ अलैहिमस्सलाम की नेमत पर अल्लाह की तारीफ़ करते हैं और अल्लाह को दुआ सुनने वाला बताते हैं।
इस दुआ की अहमियत
नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की यह दुआ हमें तीन बड़ी बातें सिखाती है।
1. नमाज़ की फिक्र-
नमाज़ इस्लाम की सबसे अहम इबादतों में से है। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह से दौलत या दुनिया की चीज़ों से पहले यह दुआ की कि उन्हें नमाज़ कायम करने वाला बनाया जाए।
2. औलाद की दीन की तरबियत-
हर मां-बाप चाहते हैं कि उनकी औलाद कामयाब हो। लेकिन एक मुसलमान के लिए असली कामयाबी सिर्फ दुनियावी तरक्की नहीं, बल्कि ईमान और आखिरत की कामयाबी भी है।
इसलिए हमें अपनी औलाद के लिए नमाज़, अच्छे अख़लाक़ और दीन पर कायम रहने की दुआ करनी चाहिए।
3. दुआ की कबूलियत की उम्मीद-
दुआ के आखिर में हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) कहते हैं-
“ऐ हमारे रब! मेरी दुआ कबूल फरमा।”
यह हमें सिखाता है कि दुआ मांगने के बाद अल्लाह से उसकी कबूलियत की उम्मीद भी रखनी चाहिए।
नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दूसरी दुआ
इसके बाद कुरआन में हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) एक और दुआ करते हैं-
अरबी-
رَبَّنَا ٱغْفِرْ لِى وَلِوَٰلِدَىَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ ٱلْحِسَابُ
हिंदी में पढ़ने का तरीका-
रब्बनग़फिर ली व लिवालिदय्य व लिल-मुमिनीना यौम यक़ूमुल हिसाब
Hinglish-
Rabbana-ghfir li wa li-waalidayya wa lil-mu’mineena yawma yaqoomul hisaab
हिंदी में मतलब-
ऐ हमारे रब! मुझे, मेरे वालिदैन और तमाम मोमिनों को उस दिन बख्श देना जिस दिन हिसाब होगा।
English Meaning-
Our Lord! Forgive me, my parents, and the believers on the Day when the reckoning takes place.
कुरआन रेफरेंस – सूरह इब्राहीम, आयत 41
कुरआन और हदीस की रोशनी में दुआ की अहमियत
कुरआन में नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की कई दुआओं का जिक्र मिलता है। उनकी दुआओं में सिर्फ दुनिया की जरूरतें नहीं, बल्कि नमाज़, हिदायत, नेक औलाद, मग़फ़िरत और आखिरत की कामयाबी शामिल है।
सूरह इब्राहीम में यह भी आता है कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी औलाद के एक हिस्से को बैतुल्लाह के पास बसाने का जिक्र किया और इसका मकसद नमाज़ कायम करना बताया।
इससे हमें यह अहम सबक मिलता है कि एक मोमिन की जिंदगी में नमाज़ और अल्लाह से रिश्ता सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में होना चाहिए।
हदीसों में भी दुआ की बड़ी अहमियत बयान की गई है और मुसलमान को अल्लाह से अपनी जरूरतें मांगने और उसी पर भरोसा रखने की तालीम दी गई है।
इस दुआ को पढ़ने के फायदे
इस दुआ के बारे में यह दावा करना सही नहीं होगा कि इसे किसी खास संख्या में पढ़ने से कोई निश्चित दुनियावी फायदा जरूर मिलेगा, क्योंकि ऐसी बात के लिए साफ़ और सही दलील चाहिए।
लेकिन कुरआन की इस दुआ को समझकर और सच्चे दिल से पढ़ना बहुत फायदेमंद है, क्योंकि इसमें हम अल्लाह से मांगते हैं –
- नमाज़ पर कायम रहने की तौफ़ीक
- औलाद के दीन पर कायम रहने की दुआ
- अपनी दुआ की कबूलियत
- अल्लाह से मजबूत रिश्ता
- आखिरत की कामयाबी की फिक्र
सबसे अहम बात यह है कि हम सिर्फ दुआ न करें, बल्कि अपनी जिंदगी में नमाज़ को भी अहमियत दें और अपनी औलाद की अच्छी इस्लामी तरबियत की कोशिश भी करें।
यह दुआ कब पढ़नी चाहिए?
आप यह दुआ किसी भी वक्त पढ़ सकते हैं। खास तौर पर-
- नमाज़ के बाद
- औलाद के लिए दुआ करते वक्त
- घर में दीन और नमाज़ की फिक्र के लिए
- तहज्जुद के वक्त
- अल्लाह से अपनी हिदायत मांगते समय
इस दुआ को अपनी रोज़ाना दुआओं में शामिल करना एक अच्छा अमल हो सकता है।
नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दुआ से मिलने वाला सबक
आज हम अक्सर अपनी औलाद के लिए अच्छी नौकरी, पैसा, पढ़ाई और दुनियावी कामयाबी की दुआ करते हैं। यह चीज़ें मांगना गलत नहीं हैं।
लेकिन हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दुआ हमें याद दिलाती है कि हमें अपनी और अपनी औलाद की नमाज़, ईमान और आखिरत की भी उतनी ही फिक्र करनी चाहिए।
असली कामयाबी सिर्फ दुनिया में आगे बढ़ना नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा हासिल करना और आखिरत में कामयाब होना है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की नमाज़ वाली दुआ कौन सी है?
दुआ है-
رَبِّ ٱجْعَلْنِى مُقِيمَ ٱلصَّلَوٰةِ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَآءِ
यह सूरह इब्राहीम की आयत 40 में मौजूद है।
2. इस दुआ को किसके लिए पढ़ सकते हैं?
यह दुआ अपने लिए और अपनी औलाद के लिए पढ़ी जा सकती है, खास तौर पर नमाज़ और दीन पर कायम रहने की नीयत से।
3. नबी इब्राहीम की दुआ हिंदी में कैसे पढ़ें?
इसे हिंदी में इस तरह पढ़ सकते हैं:
रब्बिज्अल्नी मुकीमस्सलाति व मिन ज़ुर्रिय्यती रब्बना व तक़ब्बल दुआइ।
4. क्या यह दुआ औलाद के लिए है?
जी हां, इस दुआ में हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अपने साथ अपनी ज़ुर्रिय्यत यानी औलाद और आने वाली नस्लों के लिए नमाज़ कायम रखने की दुआ करते हैं।
5. नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दुआ किस सूरह में है?
यह मशहूर दुआ सूरह इब्राहीम, आयत 40 में है।
आखिर में
नबी इब्राहीम की दुआ (अलैहिस्सलाम) हर मुसलमान के लिए बहुत बड़ा पैग़ाम रखती है। हमें सिर्फ अपनी दुनियावी जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि अपने ईमान, नमाज़ और अपनी औलाद की दीन की कामयाबी के लिए भी अल्लाह से दुआ करनी चाहिए।
अल्लाह सुब्हानवा तआला हमें और हमारी औलाद को नमाज़ कायम रखने वाला बनाए और हमारी नेक दुआओं को कबूल फरमाए।आमीन।
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