सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी
सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी इस्लामी तारीख़ की उन मशहूर मुस्लिम शख्सियतों में से हैं जिनका नाम सदियों बाद भी दुनिया भर में जाना जाता है।
मुसलमान उन्हें खास तौर पर बैतुल मुक़द्दस यानी यरूशलम की 1187 में वापसी, जंग-ए-हत्तीन और उनकी क़यादत के लिए याद करते हैं।

यूरोप में उनका नाम Saladin के तौर पर मशहूर हुआ। आज भी पश्चिमी तारीख़ की किताबों, फिल्मों और दूसरे ज़रियों में उनका ज़िक्र मिलता है। मशहूर फिल्म डायरेक्टर Ridley Scott ने 2005 में Kingdom of Heaven नाम की फिल्म बनाई, जिसमें 1187 के यरूशलम और सलाहुद्दीन की फ़ौज के बीच हुए टकराव को अहम जगह दी गई। ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट (BFI) भी इस फिल्म को सलाहुद्दीन और 1187 के यरूशलम के इर्द-गिर्द बनी बड़ी ऐतिहासिक फिल्मों में गिनता है।
लेकिन सलाहुद्दीन अय्यूबी की कहानी सिर्फ़ एक जंग या एक शहर की फ़तह की कहानी नहीं है।
उनकी ज़िंदगी में हमें सब्र, तैयारी, इत्तेहाद, क़यादत, हिम्मत और बड़े मक़सद के लिए लगातार मेहनत की कई मिसालें मिलती हैं।
सलाहुद्दीन अय्यूबी कौन थे?
सलाहुद्दीन अय्यूबी का पूरा नाम सलाहुद्दीन यूसुफ़ इब्न अय्यूब था।
उनका जन्म लगभग 1137 या 1138 ईस्वी में तक़रीत में हुआ था, जो आज के इराक़ में है। उनके वालिद नज्मुद्दीन अय्यूब और चाचा असदुद्दीन शीरकूह उस दौर के अहम फ़ौजी और हुकूमती लोगों में शामिल थे।
सलाहुद्दीन ने अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा दमिश्क में गुज़ारा। बाद में वे अपने चाचा शीरकूह के साथ मिस्र की मुहिम में शामिल हुए।
1169 ईस्वी में शीरकूह के इंतक़ाल के बाद सलाहुद्दीन मिस्र के वज़ीर बने। 1171 में फ़ातिमी ख़िलाफ़त का दौर खत्म हुआ और मिस्र में सुन्नी अब्बासी ख़िलाफ़त से जुड़ी हुकूमत क़ायम हुई। इसके बाद सलाहुद्दीन की ताक़त लगातार बढ़ती गई।
अय्यूबी सल्तनत की बुनियाद
सलाहुद्दीन सिर्फ़ मैदान-ए-जंग के फ़ौजी नहीं थे।
उन्होंने मिस्र और शाम के अलग-अलग मुस्लिम इलाक़ों को अपने साथ लाने और अपनी हुकूमत को मज़बूत करने का काम किया।
उनकी ताक़त मिस्र से आगे बढ़कर शाम और दूसरे इलाक़ों तक पहुँची। इसी दौर में अय्यूबी सल्तनत की बुनियाद मज़बूत हुई।
सलाहुद्दीन के लिए यह बहुत अहम था क्योंकि उस वक़्त क्रूसेडर ताक़तों के मुकाबले मुस्लिम इलाक़े पूरी तरह एक साथ नहीं थे।
उन्होंने धीरे-धीरे अलग-अलग मुस्लिम ताक़तों को अपने साथ लाकर एक मज़बूत फ़ौजी और हुकूमती ताक़त तैयार की।
यही इत्तेहाद आगे चलकर उनकी बड़ी कामयाबियों में काम आया।
जंग-ए-हत्तीन
सलाहुद्दीन अय्यूबी की सबसे मशहूर फ़ौजी कामयाबियों में जंग-ए-हत्तीन का नाम सबसे ऊपर आता है।
यह जंग 4 जुलाई 1187 ईस्वी को हत्तीन के पास हुई।
सलाहुद्दीन की फ़ौज ने क्रूसेडर फ़ौज को बड़ी शिकस्त दी। इस जीत के बाद फ़िलिस्तीन के कई अहम इलाक़ों पर मुस्लिम फ़ौज का असर बढ़ गया और यरूशलम की तरफ़ रास्ता खुल गया।
Metropolitan Museum के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में भी 1187 की हत्तीन की जंग में सलाहुद्दीन की फ़ौज द्वारा क्रूसेडरों को दी गई शिकस्त का ज़िक्र मिलता है।
जंग-ए-हत्तीन को सलाहुद्दीन की ज़िंदगी का एक ऐसा मोड़ माना जाता है जिसने आगे होने वाली यरूशलम की फ़तह का रास्ता तैयार किया।
बैतुल मुक़द्दस की वापसी
सलाहुद्दीन अय्यूबी का नाम सबसे ज़्यादा बैतुल मुक़द्दस की वापसी से जुड़ा हुआ है।
1099 में क्रूसेडर फ़ौजों ने यरूशलम पर क़ब्ज़ा कर लिया था। करीब 88 साल बाद 1187 में सलाहुद्दीन की फ़ौज ने शहर को दोबारा मुस्लिम हुकूमत में ला दिया। Metropolitan Museum के मुताबिक सलाहुद्दीन ने 1187 में यरूशलम को दोबारा अपने क़ब्ज़े में लिया।
2 अक्टूबर 1187 ईस्वी को यरूशलम मुस्लिम हुकूमत में वापस आया।
मुसलमानों के लिए यह बहुत बड़ी कामयाबी थी क्योंकि बैतुल मुक़द्दस इस्लाम के सबसे मुक़द्दस मक़ामात में से एक है।
सलाहुद्दीन की इस फ़तह ने उनका नाम इस्लामी तारीख़ में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
यरूशलम में उनका रवैया
सलाहुद्दीन की शोहरत सिर्फ़ उनकी फ़ौजी कामयाबियों की वजह से नहीं बनी।
यरूशलम वापस लेने के बाद शहर के ईसाई लोगों और मजहबी इमारतों के साथ उनके बर्ताव के बारे में तारीख़ के जराय में कई तफ़सीलात मिलती हैं।
Metropolitan Museum के मुताबिक सलाहुद्दीन के निजी सेक्रेटरी द्वारा दर्ज एक वाक़ये में यरूशलम के ईसाई Patriarch को शहर से निकलने की इजाज़त देने और चर्च के ख़ज़ाने को ज़ब्त न करने का ज़िक्र मिलता है।
उस दौर की जंगों के हालात आज के दौर से बहुत अलग थे, इसलिए सलाहुद्दीन से जुड़ी हर मशहूर कहानी को बिना जाँच के सही मानना ठीक नहीं होगा।
लेकिन उनके बारे में मौजूद कई तारीखी रिकॉर्ड उनकी शख्सियत में सुलह, वफ़ादारी और रहमदिली के पहलू को भी सामने लाते हैं।
रिचर्ड द लायनहार्ट से मुकाबला
यरूशलम की वापसी के बाद यूरोप से तीसरी क्रूसेड शुरू हुई।
इंग्लैंड के बादशाह रिचर्ड प्रथम, जिन्हें Richard the Lionheart के नाम से जाना जाता है, इस मुहिम के सबसे मशहूर लीडर्स में थे।
सलाहुद्दीन और रिचर्ड के बीच कई लड़ाइयाँ हुईं। दोनों एक-दूसरे के बड़े दुश्मन थे, लेकिन उनके बीच बातचीत और समझौते भी हुए।
1192 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। इसके बाद क्रूसेडर ताक़तें तटीय इलाक़ों में बनी रहीं और ईसाई ज़ायरीन के लिए यरूशलम जाने का रास्ता खुला रहा।
इस दौर ने सलाहुद्दीन का नाम मुस्लिम दुनिया के साथ-साथ यूरोप की तारीख़ में भी बहुत मशहूर कर दिया।
यूरोप में भी मशहूर हुआ सलाहुद्दीन का नाम
सलाहुद्दीन का नाम सिर्फ़ मुस्लिम दुनिया तक सीमित नहीं रहा।
यूरोप में उनका नाम Saladin के तौर पर जाना गया और वे Medieval History की मशहूर शख्सियतों में शामिल हो गए।
उनकी शख्सियत को लेकर मुस्लिम और यूरोपीय तारीख़ के जराय में अलग-अलग तस्वीरें मिलती हैं, लेकिन यह बात साफ़ है कि उनका नाम यूरोपीय तारीख़ में भी एक मशहूर मुस्लिम सुल्तान के तौर पर दर्ज हुआ।
आज भी उनकी कहानी पश्चिमी फिल्मों और किताबों में दिखाई देती है।
Kingdom of Heaven फिल्म
इसका एक मशहूर उदाहरण 2005 की हॉलीवुड फिल्म Kingdom of Heaven है।
इस फिल्म को मशहूर डायरेक्टर Ridley Scott ने बनाया था। फिल्म में 1187 के यरूशलम और सलाहुद्दीन की फ़ौज के बीच हुए टकराव को अहम जगह दी गई है।
फिल्म में सलाहुद्दीन का किरदार सीरियाई अभिनेता Ghassan Massoud ने निभाया।
British Film Institute के मुताबिक Kingdom of Heaven 2005 की Ridley Scott की 12वीं सदी पर बनी बड़ी फिल्म है और इसकी कहानी 1187 में सलाहुद्दीन की फ़ौज द्वारा ईसाई क़ब्ज़े वाले यरूशलम के बचाव के इर्द-गिर्द घूमती है।
यह बात अपने आप में दिलचस्प है कि करीब 800 साल पहले का एक मुस्लिम सुल्तान आज भी पश्चिमी सिनेमा में एक अहम किरदार के तौर पर पेश किया जाता है।
ज़रूरी बात – Kingdom of Heaven एक फिल्म है, तारीखी दस्तावेज़ नहीं। इसलिए फिल्म में दिखाई गई हर बात को असली तारीखी हक़ीक़त नहीं माना जाना चाहिए।
सलाहुद्दीन अय्यूबी की बड़ी कामयाबियाँ
सलाहुद्दीन अय्यूबी की ज़िंदगी की अहम कामयाबियों को आसान अल्फ़ाज़ में इस तरह समझा जा सकता है –
- अय्यूबी सल्तनत की बुनियाद मज़बूत करना
- मिस्र में अपनी हुकूमत को मज़बूत करना
- मिस्र और शाम के कई मुस्लिम इलाक़ों को अपने साथ लाना
- फ़ौजी और हुकूमती ताक़त को मज़बूत करना
- 1187 में जंग-ए-हत्तीन में बड़ी फ़तह हासिल करना
- फ़िलिस्तीन के कई अहम इलाक़ों को वापस लेना
- 2 अक्टूबर 1187 को बैतुल मुक़द्दस को वापस लेना
- तीसरी क्रूसेड के दौरान अपनी हुकूमत के अहम इलाक़ों को क़ायम रखना
- रिचर्ड द लायनहार्ट के साथ जंग के बाद बातचीत और समझौते तक पहुँचना
अय्यूबी सल्तनत और सलाहुद्दीन की कामयाबियों का ज़िक्र Metropolitan Museum और दूसरे तारीखी स्रोतों में भी मिलता है।
एक मुसलमान सलाहुद्दीन से क्या सीख सकता है?
सलाहुद्दीन अय्यूबी की ज़िंदगी आज के मुसलमान के लिए सिर्फ़ तारीख़ का एक बाब नहीं है।
उनकी ज़िंदगी से कई ऐसी बातें सीखी जा सकती हैं जो आज भी हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में काम आ सकती हैं।
1. बड़े मक़सद के लिए सब्र
सलाहुद्दीन को बैतुल मुक़द्दस एक दिन में हासिल नहीं हुआ।
उन्होंने कई साल तैयारी, मेहनत, जंग और हुकूमती कामों में लगाए।
इससे हमें यह सीख मिलती है कि बड़ी कामयाबी के लिए सब्र और लगातार कोशिश ज़रूरी है।
2. सिर्फ़ जोश नहीं, तैयारी भी
सलाहुद्दीन की कामयाबी सिर्फ़ जोश की वजह से नहीं थी।
उन्होंने अपनी फ़ौज, माल-ओ-असबाब और हुकूमती ताक़त को लंबे अरसे तक मज़बूत किया।
आज भी किसी मुसलमान को तालीम, कारोबार, नौकरी या किसी नेक मक़सद में कामयाबी हासिल करनी हो तो सिर्फ़ जोश काफी नहीं।
इल्म, तैयारी, मेहनत और सब्र भी ज़रूरी हैं।
3. इत्तेहाद की अहमियत
सलाहुद्दीन के दौर में मुस्लिम इलाक़े अलग-अलग हुक्मरानों के हाथ में थे।
उन्होंने धीरे-धीरे इन ताक़तों को अपने साथ लाने की कोशिश की।
इससे हमें यह सीख मिलती है कि जहाँ मुमकिन हो वहाँ इत्तेहाद और मिलकर काम करना किसी बड़े मक़सद के लिए बहुत अहम होता है।
4. मुश्किल वक़्त में हिम्मत
सलाहुद्दीन की ज़िंदगी में कई ऐसे मौक़े आए जब हालात आसान नहीं थे।
फिर भी उन्होंने अपने मक़सद को छोड़ा नहीं।
आज की ज़िंदगी में भी नाकामी, पैसों की परेशानी, नौकरी की मुश्किल या दूसरी परेशानियाँ इंसान को रोक सकती हैं।
ऐसे वक़्त में उनकी ज़िंदगी से हिम्मत और लगातार कोशिश का सबक लिया जा सकता है।
5. क़यादत का मतलब सिर्फ़ हुकूमत नहीं
सलाहुद्दीन एक सुल्तान थे, लेकिन क़यादत का मतलब सिर्फ़ बड़ा ओहदा हासिल करना नहीं है।
एक अच्छा क़ायद लोगों को एक मक़सद के लिए साथ लाता है, मुश्किल वक़्त में ज़िम्मेदारी लेता है और सही वक़्त पर सही फैसला करने की कोशिश करता है।
आज यह बात घर, कारोबार, तालीम, नौकरी और कम्युनिटी की ज़िंदगी में भी लागू होती है।
6. कामयाबी के लिए लंबे वक़्त की मेहनत
सलाहुद्दीन की कहानी हमें यह भी बताती है कि बड़ी कामयाबी के पीछे कई साल की मेहनत छिपी होती है।
बैतुल मुक़द्दस की फ़तह से पहले उन्होंने मिस्र में अपनी ताक़त बनाई, शाम में अपना असर बढ़ाया और मुस्लिम इलाक़ों को अपने साथ लाने की कोशिश की।
यानी बड़ी फ़तह से पहले बड़ी तैयारी हुई थी।
7. जंग के साथ बातचीत भी ज़रूरी
सलाहुद्दीन की ज़िंदगी सिर्फ़ जंगों से भरी हुई नहीं थी।
रिचर्ड द लायनहार्ट के साथ मुकाबले के बाद 1192 में समझौता भी हुआ।
इससे यह सीख मिलती है कि मुश्किल हालात में भी बातचीत और सुलह का रास्ता खुला रखना क़यादत का अहम हिस्सा हो सकता है।
सलाहुद्दीन अय्यूबी की वफ़ात
सलाहुद्दीन अय्यूबी का इंतक़ाल 1193 ईस्वी में दमिश्क में हुआ।
उनकी वफ़ात के बाद अय्यूबी सल्तनत उनके परिवार के अलग-अलग लोगों के हाथों में चली गई और सल्तनत कई हिस्सों में बँट गई।
सलाहुद्दीन की वफ़ात के बाद भी उनका नाम मुस्लिम और यूरोपीय तारीख़ में ज़िंदा रहा।
Metropolitan Museum सलाहुद्दीन को अय्यूबी दौर की शुरुआत से जोड़ता है और बताता है कि उनके दौर में अय्यूबी हुकूमत ने मिस्र और शाम से आगे अपना असर बढ़ाया।
हमें सलाहुद्दीन अय्यूबी की ज़िंदगी से क्या हासिल करना चाहिए?
सलाहुद्दीन अय्यूबी की कहानी को सिर्फ़ “उन्होंने यरूशलम वापस लिया” तक सीमित कर देना उनकी पूरी ज़िंदगी को बहुत छोटा कर देना होगा।
उनकी ज़िंदगी में हमें इल्म, तैयारी, सब्र, क़यादत, इत्तेहाद, हिम्मत और मुश्किल हालात में अपने मक़सद पर क़ायम रहने की कई बातें मिलती हैं।
आज के मुसलमान के लिए उनकी ज़िंदगी का एक बड़ा सबक यह हो सकता है –
बड़ा मक़सद रखिए, उसके लिए खुद को तैयार कीजिए, सब्र के साथ लगातार मेहनत कीजिए और मुश्किल वक़्त में अपने मक़सद से पीछे मत हटिए।
सलाहुद्दीन अय्यूबी की विरासत सिर्फ़ एक फ़तह की कहानी नहीं है।
यह एक ऐसे मुस्लिम क़ायद की कहानी है जिसने अपने दौर की बिखरी हुई ताक़तों को साथ लाने की कोशिश की, लंबे अरसे तक तैयारी की और आख़िरकार बैतुल मुक़द्दस को मुस्लिम हुकूमत में वापस लाने में कामयाबी हासिल की।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सलाहुद्दीन अय्यूबी कौन थे?
सलाहुद्दीन अय्यूबी 12वीं सदी के मशहूर मुस्लिम सुल्तान और फ़ौजी क़ायद थे। वे अय्यूबी सल्तनत की बुनियाद रखने वाले हुक्मरान थे और 1187 में यरूशलम को वापस लेने के लिए सबसे ज़्यादा मशहूर हैं।
सलाहुद्दीन अय्यूबी ने बैतुल मुक़द्दस कब वापस लिया?
सलाहुद्दीन अय्यूबी की फ़ौज ने 2 अक्टूबर 1187 ईस्वी को यरूशलम को दोबारा मुस्लिम हुकूमत में शामिल किया।
जंग-ए-हत्तीन कब हुई थी?
जंग-ए-हत्तीन 4 जुलाई 1187 ईस्वी को हुई थी। इसमें सलाहुद्दीन की फ़ौज ने क्रूसेडर फ़ौज को बड़ी शिकस्त दी।
यूरोप में सलाहुद्दीन अय्यूबी को किस नाम से जाना जाता है?
यूरोप और पश्चिमी तारीख़ की किताबों में उन्हें आम तौर पर Saladin के नाम से जाना जाता है। Metropolitan Museum भी उन्हें Salah al-Din, known in Europe as Saladin, के तौर पर दर्ज करता है।
क्या सलाहुद्दीन अय्यूबी पर फिल्म बनी है?
जी हाँ। मशहूर डायरेक्टर Ridley Scott ने 2005 में Kingdom of Heaven फिल्म बनाई, जिसमें 1187 के यरूशलम और सलाहुद्दीन की फ़ौज के बीच हुए टकराव को अहम जगह दी गई है।
सलाहुद्दीन अय्यूबी से मुसलमान क्या सीख सकते हैं?
उनकी ज़िंदगी से सब्र, हिम्मत, इल्म, तैयारी, इत्तेहाद, क़यादत और बड़े मक़सद के लिए लगातार मेहनत करने की सीख ली जा सकती है।
सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी पर बनी मूवी –
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