हज़रत आदम की दुआ (अलैहिस्सलाम) – 1 Powerful तौबा की दुआ जो गुनाहों पर सच्ची रहमत की उम्मीद देती है

हज़रत आदम की दुआ (अलैहिस्सलाम) 

हज़रत आदम की दुआ

जब इंसान से कोई ग़लती या गुनाह हो जाए, तो उसे मायूस होने के बजाय अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए। क़ुरआन-ए-करीम में हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और बीबी हव्वा (अलैहस्सलाम) की तौबा का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़िक्र मिलता है।

उन्होंने अपनी ग़लती का बहाना नहीं बनाया, बल्कि अपने रब के सामने अपनी कमज़ोरी का इकरार किया और मग़फ़िरत व रहमत की दुआ माँगी।

यह वही दुआ है-

हज़रत आदम की दुआ (अलैहिस्सलाम)

अरबी में-

رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ

हिंदी में पढ़ने का तरीका-

रब्बना ज़लमना अनफुसना व इल्लम तग़फ़िर लना व तरहमना लनकूनन्ना मिनल-ख़ासिरीन।

Hinglish-

Rabbana zalamna anfusana wa illam taghfir lana wa tarhamna lanakoonanna minal-khasireen.

हिंदी मतलब-

ऐ हमारे रब! हमने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया है। अगर तूने हमें माफ़ नहीं किया और हम पर रहम नहीं किया, तो हम यक़ीनन नुकसान उठाने वालों में से हो जाएंगे।

English Meaning-

Our Lord, we have wronged ourselves. If You do not forgive us and have mercy upon us, we will surely be among the losers.

यह दुआ सूरह अल-आराफ़, आयत 23 में दर्ज है। क़ुरआन में इसके बाद अल्लाह की तरफ़ से हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा के क़ुबूल होने का ज़िक्र भी मिलता है।

हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) ने यह दुआ कब माँगी?

क़ुरआन में बताया गया है कि अल्लाह ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और उनकी ज़ौजा को जन्नत में रहने की नेमत दी थी और एक ख़ास चीज़ से दूर रहने का हुक्म दिया था।

शैतान ने उन्हें बहकाया और उनसे ग़लती हो गई। इसके बाद उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने अल्लाह के सामने अपनी कमज़ोरी का इकरार किया।

उन्होंने यह नहीं कहा कि हमारी ग़लती के पीछे सिर्फ़ किसी और का कसूर है। बल्कि दोनों ने अपने रब के सामने कहा-

“रब्बना ज़लमना अनफुसना…”

यानी उन्होंने अपनी गलती को कुबूल किया और अल्लाह से मग़फ़िरत व रहमत माँगी।

क़ुरआन में हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा

सूरह अल-बक़रह में अल्लाह सुब्हानवताला फरमाते है कि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब से कुछ “कलिमात” हासिल किए और अल्लाह ने उनकी तौबा क़ुबूल फ़रमा ली।

فَتَلَقَّىٰٓ آدَمُ مِن رَّبِّهِۦ كَلِمَٰتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ

सूरह अल-बक़रह — 2:37

इस आयत में अल्लाह अपनी दो सिफ़ात का ज़िक्र करता है-

अत्तव्वाब — बार-बार तौबा क़ुबूल करने वाला
अर-रहीम — बहुत रहम करने वाला

क़ुरआन 2:37 में “कलिमात” के बाद तौबा क़ुबूल होने का ज़िक्र है, और मुफस्सिरीन ने सूरह अल-आराफ़ 7:23 में मौजूद दुआ को उन कलिमात से जोड़ा है।

इस दुआ की सबसे ख़ास बात क्या है?

इस दुआ में तौबा का एक बहुत अहम तरीका दिखाई देता है।

हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और बीबी हव्वा (अलैहस्सलाम) ने-

  • अपनी ग़लती को माना
  • अपने रब के सामने झुककर दुआ की
  • मग़फ़िरत माँगी
  • अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखी
  • अपने अंजाम को अल्लाह की माफ़ी और रहमत से जोड़ा

इसलिए यह दुआ सिर्फ़ लफ़्ज़ों का मजमूआ नहीं, बल्कि सच्ची तौबा और अल्लाह के सामने अपनी बेबसी के इज़हार की एक बड़ी मिसाल है।

इस दुआ की फ़ज़ीलत और अहमियत

इस दुआ की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि इसके अल्फ़ाज़ क़ुरआन-ए-करीम में मौजूद हैं।

सूरह अल-बक़रह 2:37 में अल्लाह सुब्हानवताला फरमाते है कि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को अपने रब से कुछ कलिमात मिले और फिर अल्लाह ने उनकी तौबा क़ुबूल फ़रमाई। उसी सिलसिले में सूरह अल-आराफ़ 7:23 में उनकी और बीबी हव्वा की दुआ मौजूद है।

इससे हमें अल्लाह की रहमत के बारे में बड़ी उम्मीद मिलती है।

लेकिन यह समझना भी ज़रूरी है कि सिर्फ़ ज़बान से दुआ पढ़ लेना तौबा की पूरी शर्त नहीं है। सच्ची तौबा में ग़लती पर शर्मिंदगी, गुनाह छोड़ना और अल्लाह की तरफ़ सच्चे दिल से लौटना शामिल है।

यह दुआ कब पढ़ सकते हैं?

इस दुआ के लिए कोई एक ख़ास वक़्त क़ुरआन में मुक़र्रर नहीं किया गया है।

आप इसे:

  • गुनाह हो जाने के बाद
  • तौबा करते समय
  • अपने दिल में शर्मिंदगी महसूस होने पर
  • अल्लाह से मग़फ़िरत माँगते समय
  • नमाज़ के बाद दुआ में
  • रात के वक़्त
  • किसी भी दूसरे मौक़े पर जब अल्लाह से रहमत माँगना चाहें

पढ़ सकते हैं।

इसे पढ़ते हुए सिर्फ़ अल्फ़ाज़ पर ध्यान देने के बजाय इसके मतलब को समझकर अल्लाह के सामने अपनी हालत पेश करना ज़्यादा अहम है।

हज़रत आदम की दुआ (अलैहिस्सलाम) से हमें क्या सबक मिलता है?

1. ग़लती होने पर मायूस न हों

इंसान से ग़लती हो सकती है। अहम बात यह है कि ग़लती के बाद वह किस तरफ़ लौटता है।

2. अपनी ग़लती को मानना चाहिए

सच्ची तौबा का एक बड़ा हिस्सा अपनी ग़लती का इकरार करना है।

3. अल्लाह की रहमत से उम्मीद रखनी चाहिए

इस दुआ में मग़फ़िरत के साथ-साथ रहमत माँगी गई है। यह बताता है कि बंदे को अपने रब की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए।

4. बहाने बनाने के बजाय रुजू करें

हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा हमें सिखाती है कि ग़लती के बाद अल्लाह की तरफ़ लौटना चाहिए।

5. तौबा के साथ अपनी ज़िंदगी सुधारनी चाहिए

सिर्फ़ दुआ पढ़ना ही काफ़ी नहीं, इंसान को अपनी ग़लती से बचने और अपने अमल को बेहतर करने की कोशिश भी करनी चाहिए।

क्या यह सिर्फ़ हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की दुआ है?

यह दुआ हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और बीबी हव्वा (अलैहस्सलाम) की तौबा के सिलसिले में क़ुरआन में दर्ज है।

इसलिए मुसलमान इसे अपनी तौबा और मग़फ़िरत की दुआ के तौर पर पढ़ सकते हैं। क़ुरआन में इसका होना ही इसे याद करने और समझने के लिए बड़ी वजह है।

एक अहम बात- “कलिमात” और दुआ का ताल्लुक

सूरह अल-बक़रह 2:37 में सिर्फ़ इतना बताया गया है कि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) ने अपने रब से कुछ “कलिमात” हासिल किए और अल्लाह ने उनकी तौबा क़ुबूल फ़रमाई।

मुफस्सिरीन ने इन कलिमात की तफ़्सीर में सूरह अल-आराफ़ 7:23 की दुआ को बयान किया है। इसलिए इस बात को यूँ कहना ज़्यादा एहतियाती और authentic है कि सूरह अल-आराफ़ 7:23 में हज़रत आदम और बीबी हव्वा की तौबा के अल्फ़ाज़ दर्ज हैं, और सूरह अल-बक़रह 2:37 में उन “कलिमात” और तौबा क़ुबूल होने का ज़िक्र है।

हदीस से क्या मालूम होता है?

सहीह हदीस में हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के बीच हुई बातचीत का ज़िक्र मिलता है, जिसमें हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा और अल्लाह के फ़ैसले की मालूमात है।

लेकिन इस ख़ास दुआ के बारे में कोई ऐसी मशहूर सहीह हदीस पेश करना ठीक नहीं जिसमें यह कहा गया हो कि इसे किसी ख़ास संख्या में पढ़ने से कोई निश्चित दुनियाावी फ़ायदा ज़रूर मिलेगा।

इसलिए इस दुआ की फ़ज़ीलत बताते समय क़ुरआन के साफ़ हवाले को ही सबसे बुनियादी दलील रखना चाहिए।

क्या यह दुआ गुनाहों की माफी के लिए पढ़ सकते हैं?

जी हाँ, अल्लाह से मग़फ़िरत और रहमत माँगने के लिए इसे पढ़ा जा सकता है।

लेकिन तौबा सिर्फ़ ज़बान से अल्फ़ाज़ दोहराने का नाम नहीं है। इंसान को अपने गुनाह पर नदामत हो, गुनाह छोड़ने की कोशिश करे और दोबारा उससे बचने का इरादा रखे।

अगर किसी इंसान का गुनाह किसी दूसरे इंसान के हक़ से जुड़ा है, तो उस हक़ को अदा करना या जहाँ मुमकिन हो वहाँ उसकी भरपाई करना भी ज़रूरी है।

5 अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की दुआ कौन सी है?

हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और बीबी हव्वा (अलैहस्सलाम) की तौबा की दुआ है:

رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ

यह सूरह अल-आराफ़, आयत 23 में है।

2. हज़रत आदम की दुआ किस सूरह में है?

यह दुआ सूरह अल-आराफ़, 7:23 में मौजूद है।

3. क्या हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा क़ुबूल हुई थी?

जी हाँ। सूरह अल-बक़रह 2:37 में साफ़ बताया गया है कि अल्लाह ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा क़ुबूल फ़रमाई।

4. क्या यह दुआ हर मुसलमान पढ़ सकता है?

जी हाँ। यह क़ुरआन में दर्ज दुआ है और अल्लाह से अपनी ग़लती की माफ़ी और रहमत माँगने के लिए पढ़ी जा सकती है।

5. इस दुआ का सबसे बड़ा सबक क्या है?

इस दुआ का बड़ा सबक यह है कि ग़लती होने के बाद इंसान को अल्लाह से दूर नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी ग़लती मानकर सच्चे दिल से उसकी तरफ़ रुजू करना चाहिए।

आख़िरी बात

हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की यह दुआ हमें तौबा का एक बेहद ख़ूबसूरत तरीका सिखाती है।

“रब्बना ज़लमना अनफुसना…”

इन अल्फ़ाज़ में अपनी ग़लती का इकरार भी है, मग़फ़िरत की दरख़्वास्त भी है और अल्लाह की रहमत की उम्मीद भी।

जब इंसान अपनी कमज़ोरी को मानकर अपने रब की तरफ़ सच्चे दिल से लौटता है, तो उसे अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए।

अल्लाह हमें सच्ची तौबा करने, गुनाहों से बचने और हमेशा अपनी रहमत की तरफ़ रुजू करने वाला बनाए। आमीन।

क़ुरआन के हवाले

सूरह अल-आराफ़ — 7:23
हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) और बीबी हव्वा (अलैहस्सलाम) की तौबा की दुआ।

सूरह अल-बक़रह — 2:37
हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को दिए गए “कलिमात” और उनकी तौबा क़ुबूल होने का ज़िक्र।

सूरह ताहा — 20:122
अल्लाह की तरफ़ से हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा क़ुबूल किए जाने और हिदायत दिए जाने का ज़िक्र।

जज़ाकल्लाह खैर। अल्लाह सुब्हानवताला इस कोशिश में हुई छोटी बड़ी गलती को माफ़ करे  – आमीन ।

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