ग़ुस्ल की दुआ और इस्लामी रहनुमाई

ग़ुस्ल की दुआ क्या है?
इस्लाम में ग़ुस्ल का मतलब पूरे जिस्म को शरीअत के मुताबिक़ धोकर पाकी हासिल करना है। कुछ हालात में ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो जाता है, जैसे जनाबत की हालत और औरतों के लिए हैज़ या निफ़ास ख़त्म होने के बाद।
बहुत से लोग ग़ुस्ल की दुआ जानना चाहते हैं और इंटरनेट पर अलग-अलग दुआएँ पढ़ते हैं। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से ग़ुस्ल के लिए कोई ख़ास और तयशुदा दुआ सहीह हदीस से साबित नहीं है।
ग़ुस्ल शुरू करते समय बिस्मिल्लाह कहना मुस्तहब माना गया है। ग़ुस्ल के दौरान कोई ख़ास दुआ पढ़ना ज़रूरी नहीं है।
ग़ुस्ल की दुआ अरबी में
ग़ुस्ल शुरू करने से पहले पढ़े जाने वाले छोटे ज़िक्र के तौर पर बिस्मिल्लाह कहा जा सकता है।
अरबी-
بِسْمِ اللَّهِ
हिंदी उच्चारण-
बिस्मिल्लाह।
Hinglish-
Bismillah.
हिंदी मतलब-
अल्लाह के नाम से।
English Meaning-
In the name of Allah.
यहाँ यह बात जहन में रखें कि बिस्मिल्लाह को ग़ुस्ल की ख़ास, सहीह हदीस से साबित दुआ के रूप में पेश नहीं करना चाहिए। ग़ुस्ल से पहले इसे कहने की फ़ज़ीलत और हुक्म के बारे में उलमा के बीच दलीलों की बुनियाद पर इख़्तिलाफ़ पाया जाता है।
ग़ुस्ल के बाद पढ़ी जाने वाली दुआ
अगर ग़ुस्ल के दौरान वुज़ू भी किया गया है, तो वुज़ू के बाद पढ़ी जाने वाली शहादत की दुआ पढ़ी जा सकती है। यह दुआ सहीह हदीस में वुज़ू के बाद आई है।
अरबी दुआ-
أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ
हिंदी उच्चारण-
अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहू ला शरीका लहू, व अश्हदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।
Hinglish–
Ash-hadu alla ilaha illallahu wahdahu la sharika lahu, wa ash-hadu anna Muhammadan abduhu wa rasuluhu.
हिंदी मतलब-
मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं। वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद ﷺ उसके बंदे और रसूल हैं।
English Meaning-
I bear witness that there is no deity worthy of worship except Allah alone, without any partner, and I bear witness that Muhammad is His servant and Messenger.
हदीस का हवाला- सहीह मुस्लिम में वुज़ू के बाद पढ़ी जाने वाली शहादत की दुआ का ज़िक्र मिलता है। इसे ग़ुस्ल की अलग, जरुरी दुआ न समझें।
कुरआन में ग़ुस्ल का हुक्म
अल्लाह तआला ने कुरआन में पाकी हासिल करने का हुक्म दिया है।
सूरह अल-माइदा – आयत 6
अल्लाह सुब्हानवा तआला फरमाते है कि अगर तुम जनाबत की हालत में हो, तो अच्छी तरह पाकी हासिल करो। – कुरआन, सूरह अल-माइदा 5:6
इस आयत से मालूम होता है कि जनाबत की हालत में पाकी हासिल करना ज़रूरी है। आयत में ग़ुस्ल का हुक्म है, लेकिन ग़ुस्ल के लिए कोई ख़ास दुआ के अल्फ़ाज़ नहीं बताए गए हैं।
ज़रूरी बात – कुरआन की आयत का मतलब और ग़ुस्ल की दुआ को एक ही चीज़ नहीं समझना चाहिए।
ग़ुस्ल के बारे में सहीह हदीस
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम के ग़ुस्ल के तरीक़े के बारे में रिवायत मिलती है।
सहीह रिवायतों में आता है कि नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ग़ुस्ल के दौरान हाथ धोते, नापाकी की जगह साफ़ करते, वुज़ू करते और सिर पर पानी डालते थे। इससे ग़ुस्ल के सही तरीक़े की रहनुमाई मिलती है।
हवाला – सहीह अल-बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से ग़ुस्ल के तरीक़े की रिवायतें।
एक दूसरी रिवायत में हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से आता है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ग़ुस्ल करते समय अपने सिर पर तीन बार पानी डालते थे।
हवाला- सुनन अन-नसाई, हदीस 426।
ग़ुस्ल की दुआ की फ़ज़ीलत
ग़ुस्ल इस्लाम में पाकी और इबादत से जुड़ा हुआ अहम अमल है। ग़ुस्ल के ज़रिए मुसलमान शरीअत के मुताबिक़ पाकी हासिल करता है और इबादत के लिए तैयार होता है।
ग़ुस्ल की कोई ख़ास दुआ सहीह हदीस से साबित न होने की वजह से उसके लिए कोई ख़ास सवाब, तयशुदा संख्या या गारंटी बताना सही नहीं है।
ग़ुस्ल से मिलने वाली अहम रहनुमाई
- पाकी हासिल करना इस्लाम की अहम तालीम है।
- ग़ुस्ल के सही तरीक़े का एहतिमाम करना चाहिए।
- दुआ और ज़िक्र करते समय सहीह हवाले को तरजीह देनी चाहिए।
- ऐसी दुआ को सुन्नत न बताएं जो नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से साबित नहीं है।
- अल्लाह की इबादत में नीयत और शरीअत के मुताबिक़ अमल की अहमियत है।
क्या ग़ुस्ल की नीयत ज़ुबान से पढ़ना ज़रूरी है?
ग़ुस्ल की नीयत दिल के इरादे से होती है। इंसान को मालूम हो कि वह अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ पाकी हासिल करने के लिए ग़ुस्ल कर रहा है।
नीयत के लिए कोई ख़ास अरबी जुमला ज़ुबान से पढ़ना ज़रूरी नहीं है। अलग-अलग फ़िक़्ही मसाइल में नीयत की अहमियत और तरीक़े की तफ़सील मिलती है।
ग़ुस्ल के दौरान दुआ पढ़ना
ग़ुस्ल के दौरान कोई ख़ास दुआ सहीह हदीस से साबित नहीं है। ग़ुस्ल की जगह, जिस्म की हालत और अदब का भी ख़याल रखना चाहिए।
कुछ उलमा ने बाथरूम में दुआ या ज़िक्र करने के बारे में अदब और मकरूह होने की चर्चा की है, ख़ासकर जब सतर खुला हो या नापाक पानी गिरने की जगह हो। इसलिए ज़िक्र के बारे में अपने भरोसेमंद आलिम से फ़िक़्ही रहनुमाई लेना बेहतर है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. क्या ग़ुस्ल की कोई ख़ास दुआ सहीह हदीस से साबित है?
नहीं, ग़ुस्ल के लिए कोई तयशुदा ख़ास दुआ सहीह हदीस से साबित नहीं है। ग़ुस्ल शुरू करते समय बिस्मिल्लाह कहने को कई फ़ुक़हा ने मुस्तहब माना है।
2. क्या हमबिस्तरी के बाद ग़ुस्ल की अलग दुआ पढ़नी चाहिए?
हमबिस्तरी के बाद ग़ुस्ल के लिए कोई ख़ास, सहीह हदीस से साबित दुआ नहीं है। इस हालत में शरीअत के मुताबिक़ ग़ुस्ल करना ज़रूरी है, और किसी तयशुदा दुआ को फ़र्ज़ या लाज़िमी नहीं समझना चाहिए।
3. क्या औरतों के लिए ग़ुस्ल की दुआ अलग है?
नहीं, ग़ुस्ल की कोई अलग ख़ास दुआ मर्दों और औरतों के लिए सहीह हदीस से साबित नहीं है। हैज़ या निफ़ास ख़त्म होने के बाद पाकी हासिल करने के लिए ग़ुस्ल किया जाता है।
4. क्या ग़ुस्ल के बाद शहादत की दुआ पढ़ सकते हैं?
हाँ, अगर ग़ुस्ल के साथ वुज़ू किया गया है, तो वुज़ू के बाद पढ़ी जाने वाली शहादत की दुआ पढ़ी जा सकती है। यह दुआ सहीह हदीस में वुज़ू के बाद आती है। इसे ग़ुस्ल की ख़ास अनिवार्य दुआ न समझें।
5. क्या ग़ुस्ल के बिना नमाज़ पढ़ सकते हैं?
अगर किसी शख़्स पर ग़ुस्ल फ़र्ज़ है, तो नमाज़ के लिए शरीअत के मुताबिक़ पाकी हासिल करना ज़रूरी है। कुरआन की सूरह अल-माइदा 5:6 में जनाबत की हालत में पाकी हासिल करने का हुक्म दिया गया है।
नतीजा
ग़ुस्ल की दुआ के बारे में सबसे अहम बात यह है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम से कोई ख़ास, तयशुदा ग़ुस्ल की दुआ सहीह हदीस से साबित नहीं है। बिस्मिल्लाह कहकर ग़ुस्ल शुरू किया जा सकता है और ग़ुस्ल के सही तरीक़े का ख़याल रखना चाहिए।
इस्लाम में पाकी का बड़ा मक़ाम है। इसलिए ग़ुस्ल के मसाइल सहीह कुरआनी आयतों, हदीस और भरोसेमंद उलमा की रहनुमाई से सीखना चाहिए।
अल्लाह सुब्हानवा तआला हमें सही इल्म हासिल करने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
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