इस्तिखारा की दुआ – 3 असरदार तरीके, सही फैसला और गलत राह से बचने की दुआ

इस्तिखारा की दुआ – सही फैसला लेने की दुआ

इस्तिखारा की दुआ

इस्तिखारा क्या है?

इस्तिखारा का मतलब है किसी ऐसे मामले में अल्लाह से खैर और बेहतर रास्ता मांगना, जिसमें इंसान को फैसला करने में उलझन हो।

इंसान अपनी कोशिश, जानकारी और मशवरे के बाद भी हर चीज़ का अंजाम नहीं जानता। अल्लाह सुब्हानवा तआला हर चीज़ का इल्म रखने वाला है। इसलिए जब किसी जायज़ काम के बारे में दिल में उलझन हो, तो इस्तिखारा करके अल्लाह से यह दुआ की जाती है कि अगर यह काम मेरे दीन, दुनिया और अंजाम के लिए बेहतर है तो इसे मेरे लिए आसान कर दे, और अगर इसमें मेरे लिए नुकसान है तो इसे मुझसे और मुझे इससे दूर कर दे।

नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने सहाबा को इस्तिखारा सिखाया और हज़रत जाबिर रदिअल्लाहुताला अन्हु से रिवायत है कि आप रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम उन्हें इस्तिखारा उसी तरह सिखाते थे जैसे कुरआन की सूरत सिखाते थे। सहीह अल-बुखारी, हदीस 6382 में इसके लिए दो रकअत गैर-फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने और फिर इस्तिखारा की दुआ करने का ज़िक्र है।

इस्तिखारा की दुआ अरबी में

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْتَخِيرُكَ بِعِلْمِكَ، وَأَسْتَقْدِرُكَ بِقُدْرَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ الْعَظِيمِ، فَإِنَّكَ تَقْدِرُ وَلَا أَقْدِرُ، وَتَعْلَمُ وَلَا أَعْلَمُ، وَأَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ۔

اللَّهُمَّ إِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الْأَمْرَ خَيْرٌ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي، أَوْ قَالَ: فِي عَاجِلِ أَمْرِي وَآجِلِهِ، فَاقْدُرْهُ لِي، وَإِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الْأَمْرَ شَرٌّ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي، أَوْ قَالَ: فِي عَاجِلِ أَمْرِي وَآجِلِهِ، فَاصْرِفْهُ عَنِّي وَاصْرِفْنِي عَنْهُ، وَاقْدُرْ لِيَ الْخَيْرَ حَيْثُ كَانَ، ثُمَّ رَضِّنِي بِهِ۔

وَيُسَمِّي حَاجَتَهُ

यानी दुआ में “هَذَا الْأَمْرَ” के जगह पर अपने जिस जायज़ काम के बारे में इस्तिखारा कर रहे हैं, उसे दिल में या ज़रूरत के मुताबिक ज़िक्र करें। हदीस में भी अपनी ज़रूरत का ज़िक्र करने की बात आई है।

इस्तिखारा की दुआ हिंदी में

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्तखीरुका बि-इल्मिका, व अस्तक़दिरुका बि-क़ुदरतिका, व अस्अलुका मिन फ़ज़्लिकल-अज़ीमि, फ़-इन्नका तक़दिरु व ला अक़दिरु, व तअलमु व ला आ’लमु, व अंता अल्लामुल-ग़ुयूबी।

अल्लाहुम्मा इन् कुंता तअलमु अन्ना हाज़ल-अम्रा ख़ैरुल-ली फ़ी दीनि व मआशी व आक़िबति अम्री, औ क़ाला फ़ी आजिली अम्री व आजिलिही, फ़क़्दुरहु ली, व इन् कुंता तअलमु अन्ना हाज़ल-अम्रा शर्रुल-ली फ़ी दीनि व मआशी व आक़िबति अम्री, औ क़ाला फ़ी आजिली अम्री व आजिलिही, फ़स्रिफ़हु अन्नी वस्रिफ़नी अन्हु, वक़्दुर लियल-ख़ैरा हैसु काना, सुम्मा रज़्ज़िनी बिही।

इसके बाद अपनी ज़रूरत या जिस मामले के लिए इस्तिखारा कर रहे हैं उसका ज़िक्र करें।

Istikhara Ki Dua Hinglish Mein

Allahumma inni astakhiruka bi’ilmika, wa astaqdiruka biqudratika, wa as’aluka min fadlikal-‘azeem, fa innaka taqdiru wa la aqdiru, wa ta’lamu wa la a’lamu, wa anta ‘allamul-ghuyub.

Allahumma in kunta ta’lamu anna hazal-amra khairun li fi dini wa ma’ashi wa ‘aqibati amri, aw qala fi ‘ajili amri wa ajilihi, faqdurhu li, wa in kunta ta’lamu anna hazal-amra sharrun li fi dini wa ma’ashi wa ‘aqibati amri, aw qala fi ‘ajili amri wa ajilihi, fasrifhu ‘anni wasrifni ‘anhu, waqdur liyal-khaira haithu kana, summa raddini bihi.

इसके बाद अपनी ज़रूरत का ज़िक्र करें।

इस्तिखारा की दुआ का हिंदी मतलब

ऐ अल्लाह! मैं तेरे इल्म के ज़रिए तुझसे खैर मांगता हूँ और तेरी कुदरत के ज़रिए ताक़त मांगता हूँ और तेरे बड़े फ़ज़्ल का सवाल करता हूँ। बेशक तू कुदरत रखता है और मैं कुदरत नहीं रखता, तू जानता है और मैं नहीं जानता और तू ही ग़ैब की तमाम बातों को जानने वाला है।

ऐ अल्लाह! अगर तेरे इल्म में यह काम मेरे दीन, मेरी ज़िंदगी और मेरे अंजाम के लिए बेहतर है, तो इसे मेरे लिए मुक़द्दर कर दे और इसे मेरे लिए आसान कर दे और इसमें मेरे लिए बरकत दे।

और अगर तेरे इल्म में यह काम मेरे दीन, मेरी ज़िंदगी और मेरे अंजाम के लिए नुकसानदेह है, तो इसे मुझसे दूर कर दे और मुझे इससे दूर कर दे। और मेरे लिए जहाँ भी खैर हो, उसे मुक़द्दर कर दे और फिर मुझे उस पर राज़ी कर दे।

Meaning of Istikhara Dua in English

O Allah, I seek the better choice from You by Your knowledge, and I seek ability from You by Your power, and I ask You from Your great bounty. Surely, You have power and I do not have power; You know and I do not know; and You are the Knower of the unseen.

O Allah, if You know that this matter is good for me in my religion, my livelihood and the outcome of my affair, then decree it for me, make it easy for me and bless it for me.

And if You know that this matter is bad for me in my religion, my livelihood and the outcome of my affair, then turn it away from me and turn me away from it. And decree for me whatever is good wherever it may be, and then make me content with it.

इस्तिखारा कैसे करें?

सहीह हदीस में इस्तिखारा का तरीका बहुत साफ़ बताया गया है।

1. अपने मामले के बारे में सोचें

सबसे पहले यह देखें कि जिस काम के बारे में आप इस्तिखारा करना चाहते हैं वह जायज़ है या नहीं।

हराम काम के लिए इस्तिखारा नहीं किया जाता। इसी तरह जो काम फ़र्ज़ या वाजिब है, उसे करने या न करने के लिए इस्तिखारा नहीं किया जाता।

2. दो रकअत नमाज़ पढ़ें

नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने इस्तिखारा के लिए दो रकअत गैर-फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने का ज़िक्र फरमाया है।

3. इस्तिखारा की दुआ पढ़ें

दो रकअत नमाज़ के बाद ऊपर दी गई इस्तिखारा की दुआ पढ़ें और जिस मामले के बारे में फैसला चाहते हैं, उसका ज़िक्र करें।

यह तरीका सहीह अल-बुखारी 6382 की हदीस से साबित है।

4. अल्लाह पर भरोसा करें

इस्तिखारा के बाद बार-बार यह सोचते रहना कि “मुझे कौन सा इशारा मिलेगा?” इस्तिखारा का मकसद नहीं है।

इंसान को अपनी तरफ से जायज़ कोशिश, जानकारी हासिल करने और मशवरा करने के बाद अल्लाह पर तवक्कुल करना चाहिए।

क्या इस्तिखारा के बाद ख्वाब आना ज़रूरी है?

नहीं। सहीह हदीस में इस्तिखारा के बाद ख्वाब देखने को शर्त नहीं बनाया गया है

हदीस में दो रकअत नमाज़ और इस्तिखारा की दुआ का ज़िक्र है। इसमें यह नहीं कहा गया कि इंसान को ज़रूर कोई ख्वाब आएगा या किसी खास रंग के ज़रिए फैसला मालूम होगा।

इसलिए सिर्फ ख्वाब का इंतज़ार करना इस्तिखारा का जरूरी हिस्सा नहीं है।

इस्तिखारा के बाद क्या करना चाहिए?

इस्तिखारा के बाद इंसान को अपने मामले में सही जानकारी हासिल करनी चाहिए, भरोसेमंद लोगों से मशवरा करना चाहिए और फिर अल्लाह पर तवक्कुल करके फैसला करना चाहिए।

कुरआन में अल्लाह सुब्हानवताला तआला फरमाते है कि मामलों में मशवरा करो और जब फैसला कर लो तो अल्लाह पर भरोसा करो। सूरह आल-इमरान 3:159 में यह हिदायत दी गई है।

इससे यह बात समझ आती है कि इस्लाम में इस्तिखारा, मशवरा और अपनी जायज़ कोशिश एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं।

इस्तिखारा की फ़ज़ीलत

इस्तिखारा की सबसे बड़ी फ़ज़ीलत यह है कि इंसान अपने सीमित इल्म को छोड़कर उस अल्लाह से रहनुमाई मांगता है जो हर चीज़ का इल्म रखता है।

सहीह अल-बुखारी की रिवायत में हज़रत जाबिर रदिअल्लाहुताला अन्हु बताते हैं कि नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम सहाबा को इस्तिखारा सिखाते थे और इसे बहुत अहम तरीके से सिखाया जाता था।

इस्तिखारा की दुआ में इंसान तीन अहम बातें मांगता है –

  • अगर काम में खैर है तो अल्लाह उसे मुक़द्दर और आसान कर दे।
  • अगर काम में शर है तो अल्लाह उसे दूर कर दे।
  • जहाँ भी खैर हो, अल्लाह उसे नसीब करे और उस पर दिल को राज़ी कर दे।

इस तरह इस्तिखारा सिर्फ “सही फैसला बताने” की दुआ नहीं, बल्कि अल्लाह के इल्म, कुदरत और फैसले पर भरोसा करने की दुआ भी है।

इस्तिखारा किन मामलों में कर सकते हैं?

इस्तिखारा जायज़ और अहम मामलों में किया जा सकता है, जैसे –

  • शादी का फैसला
  • नौकरी या बिज़नेस का फैसला
  • किसी जगह शिफ्ट होने का फैसला
  • सफर का फैसला
  • किसी जायज़ प्रोजेक्ट को शुरू करना
  • पढ़ाई या करियर से जुड़ा फैसला
  • किसी दूसरे महत्वपूर्ण जायज़ मामले में फैसला

लेकिन अगर कोई काम साफ़ तौर पर हराम है या कोई काम फ़र्ज़ है, तो उसके बारे में इस्तिखारा करके उसे छोड़ने या करने का फैसला नहीं किया जाता।

क्या इस्तिखारा खुद करना चाहिए या कोई दूसरा कर सकता है?

सहीह बुखारी की हदीस में नबी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलय्हि वसल्लम ने उस शख्श को दो रकअत नमाज़ और दुआ करने की हिदायत दी है जो किसी काम का इरादा रखता हो। इसलिए आम तौर पर इंसान खुद अपने लिए इस्तिखारा करता है

दूसरे मुसलमान से अपने लिए दुआ करवाना अलग बात है, लेकिन इस्तिखारा की सुन्नत का तरीका खुद दो रकअत पढ़कर दुआ करना है।

इस्तिखारा और मशवरा में क्या फर्क है?

मशवरा का मतलब है किसी मामले में समझदार और भरोसेमंद लोगों से राय लेना।

इस्तिखारा का मतलब है अल्लाह से अपने लिए खैर मांगना और अपने मामले का फैसला उसके इल्म और कुदरत के हवाले करना।

दोनों को साथ किया जा सकता है। कुरआन में भी मशवरा करने और फिर फैसला करके अल्लाह पर तवक्कुल करने की हिदायत मिलती है।

इस्तिखारा के बारे में एक अहम बात

इस्तिखारा का मतलब यह नहीं कि इंसान अपनी जिम्मेदारी छोड़ दे और सिर्फ किसी इशारे का इंतज़ार करता रहे।

सही तरीका यह है –

जानकारी हासिल करें → मशवरा करें → इस्तिखारा करें → फैसला करें → अल्लाह पर तवक्कुल करें।

अगर किसी जायज़ काम में आगे बढ़ने के बाद रास्ता आसान होता है या हालात बदलते हैं, तो हर घटना को किसी खास “इशारे” के तौर पर लेना जरूरी नहीं है। इंसान को सामान्य समझ, सही जानकारी और शरीअत की हिदायत के मुताबिक अपना फैसला करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. इस्तिखारा की दुआ कब पढ़नी चाहिए?

सहीह हदीस के मुताबिक पहले दो रकअत गैर-फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ी जाती है और उसके बाद इस्तिखारा की दुआ पढ़ी जाती है।

2. क्या इस्तिखारा के बाद ख्वाब आना जरूरी है?

नहीं। सहीह हदीस में इस्तिखारा के बाद ख्वाब को जरूरी नहीं बताया गया है। इसलिए ख्वाब न आने का मतलब यह नहीं कि इस्तिखारा नहीं हुआ।

3. क्या इस्तिखारा शादी के लिए ही किया जाता है?

नहीं। इस्तिखारा सिर्फ शादी के लिए नहीं है। सहीह हदीस में इसे “उमूर” यानी मामलों में करने की शिक्षा दी गई है। जायज़ और महत्वपूर्ण फैसलों में इस्तिखारा किया जा सकता है।

4. क्या इस्तिखारा एक बार ही करना चाहिए?

सहीह हदीस में इस्तिखारा के लिए कोई ऐसी निश्चित संख्या नहीं बताई गई कि इसे केवल एक ही बार किया जाए या किसी खास संख्या में दोहराया जाए। इसलिए किसी निश्चित संख्या को सुन्नत समझकर जरूरी नहीं बनाया जाना चाहिए।

5. क्या इस्तिखारा के बाद फैसला तुरंत समझ में आ जाता है?

जरूरी नहीं। इस्तिखारा का मकसद भविष्य की कोई निश्चित खबर हासिल करना नहीं है। दुआ में अल्लाह से यह मांग की जाती है कि अगर काम में खैर है तो वह उसे मुक़द्दर और आसान करे और अगर उसमें शर है तो उसे दूर कर दे।

इस्तिखारा की दुआ – आर्टिकल का नतीजा

इस्तिखारा में बंदा अल्लाह से कहता है –

“ऐ अल्लाह! तू जानता है, मैं नहीं जानता। तू कुदरत रखता है, मैं नहीं रखता। अगर यह काम मेरे लिए बेहतर है तो इसे मेरे लिए आसान और मुबारक कर दे, और अगर इसमें मेरे लिए नुकसान है तो इसे मुझसे और मुझे इससे दूर कर दे।”

यही इस्तिखारा की दुआ की खूबसूरती है कि इंसान अपने फैसले को अल्लाह के इल्म और हिकमत के हवाले करता है और फिर उसके फैसले पर राज़ी रहने की दुआ करता है।

इस्तिखारा की दुआ का हवाला

हदीस – सहीह अल-बुखारी, हदीस नंबर 6382, किताबुल-अदइया / Book of Invocations, इस्तिखारा के बारे में हदीस।

कुरआन – सूरह आल-इमरान, आयत 159 — मशवरा करने और फैसला करने के बाद अल्लाह पर तवक्कुल करने की हिदायत।

अहम बात –  इस्तिखारा की पूरी दुआ हदीस से साबित है, इसे कुरआन की आयत कहना सही नहीं होगा।

जज़ाकल्लाह खैर। अल्लाह सुब्हानवताला इस कोशिश में हुई छोटी बड़ी गलती को माफ़ करे  – आमीन ।

होम पेज – https://islamicknowledgehindi.com/

हमारे यूट्यूब पेज को चेक करें ( DoFollow ) – https://www.youtube.com/@DaastanByJafar